कोलकाता एयरपोर्ट मस्जिद विवाद: राष्ट्रीय सुरक्षा बड़ी या वोट बैंक की राजनीति? जानिए 136 साल पुराना सच
यह कोई आम जगह नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का अति-सुरक्षित इलाका है। यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
यह कोई आम जगह नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का अति-सुरक्षित इलाका है। यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। लेकिन रनवे से महज 165 मीटर की दूरी पर यह मस्जिद खड़ी है। यह मस्जिद 1890 के दशक में बनी थी। तब यह एक छोटा और शांत गांव था। साल 1924 में अंग्रेजों ने यहां दमदम एयरोड्रोम बनाया। 1950 और 1960 के दशक में हवाई अड्डे का बड़ा विस्तार हुआ। सरकार ने जमीन अधिग्रहित की। गांव वालों को जेसोर रोड के पार बसा दिया गया। लेकिन मस्जिद वहीं रह गई। आज यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के भीतर एक बड़ा सुरक्षा जोखिम बन चुकी है।ब्यूरो ऑफ सिविल एविशिएन सिक्योरिटी (बीसीएएस) और नागरिक उड्डयन मंत्रालय वर्षों से इस पर आपत्ति जता रहे हैं।
इस विवाद को समझने के लिए ये पांच सबसे चौंकाने वाली बातें जानना जरूरी है:-मस्जिद के कारण रनवे छोटा करना पड़ा है। मुख्य रनवे बंद होने पर बड़े और भारी विमान यहां इमरजेंसी लैंडिंग नहीं कर सकते।मस्जिद की वजह से रनवे पर आधुनिक इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) नहीं लग पा रहा है। सर्दियों के कोहरे में विमानों की आवाजाही ठप हो जाती है।स्थानीय नमाजियों को एयरपोर्ट के अंदर बस से ले जाया जाता है। ये बसें उस रास्ते से गुजरती हैं जहां से विमान निकलते हैं। यह बेहद खतरनाक है।अंतरराष्ट्रीय सीमा के इतने पास होने के बाद भी, लोग सिर्फ साधारण लोकल आईडी कार्ड दिखाकर इस अति-सुरक्षित जोन में चले जाते हैं।ज्योति बसु की वामपंथी सरकार से लेकर ममता बनर्जी तक, किसी भी सरकार ने वोट बैंक खिसकने के डर से इस पर हाथ नहीं लगाया।इस मुद्दे पर राजनीति चरम पर है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार सुरक्षा का बहाना बना रही है। लेकिन इतिहास कुछ और कहता है। कोलकाता में विकास और सुरक्षा के लिए पहले भी धार्मिक स्थल हटे हैं।साल 2022 में खुद तृणमूल सरकार ने आठ जिलों के कलेक्टरों को निर्देश दिया था। उन्होंने साफ कहा था कि सड़कों से अवैध धार्मिक ढांचे हटाए जाएं। साल 2024 में ममता बनर्जी ने सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए सख्त अभियान चलाया। मेट्रो के काम के लिए दो 250 साल पुरानी मूर्तियों को शिफ्ट किया गया। इसी महीने उन्हें नए घर में स्थापित किया गया है।
सर्कुलर रेलवे के विस्तार के दौरान हुगली नदी के किनारे से दर्जनों मंदिर और मजारें हटाई गई थीं।
