कौन थे सोनम वांगचुक के पिता?: अनशन तुड़वाने खुद लेह पहुंची थीं इंदिरा; 42 साल बाद सोनिया ने क्यों याद किया?
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को याद दिलाया कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वर्ष 1984 में लेह गई
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को याद दिलाया कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वर्ष 1984 में लेह गई थीं। उनका मकसद सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग को लेकर चल रही उनकीभूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए मनाना था। यह बात संसद के मानसून सत्र से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सामने आई, जब कुछ नेता वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने को लेकर असमंजस की स्थिति में थे। सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने आंदोलन का समर्थन करने की बात कही। इसके कुछ समय बाद उनके निर्देश पर कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने सोनम वांगचुक से मुलाकात की, उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया और कांग्रेस की ओर से पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को याद दिलाया कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वर्ष 1984 में लेह गई थीं। उनका मकसद सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग को लेकर चल रही उनकीभूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए मनाना था।यह बात संसद के मानसून सत्र से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सामने आई, जब कुछ नेता वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने को लेकर असमंजस की स्थिति में थे।सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने आंदोलन का समर्थन करने की बात कही। इसके कुछ समय बाद उनके निर्देश पर कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने सोनम वांगचुक से मुलाकात की, उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया और कांग्रेस की ओर से पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया।
क्या पिता और बेटे के आंदोलन में समानता है? इस घटना ने पिता और बेटे की चार दशक लंबी एक अनोखी कहानी को भी फिर से सामने ला दिया है। 42 साल के अंतराल पर सोनम वांग्याल और उनके बेटे सोनम वांगचुक दोनों ने गांधीवादी तरीके यानी भूख हड़ताल को अपनाया। लेकिन दोनों की मांगें अलग-अलग थीं। पूर्व कांग्रेस विधायक रहे सोनम वांग्याल ने लद्दाख की सांविधानिक पहचान के लिए संघर्ष किया था। वहीं, उनके बेटे सोनम वांगचुक ने लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर अभियान चलाया। अब वह भारत की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग वाले आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। जब इंदिरा गांधी पहुंची थीं लेह साल 1984 में सोनम वांग्याल ने लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। लद्दाख स्टडीज में प्रकाशित उनके संस्मरण और अन्य ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इंदिरा गांधी लेह पहुंचीं और उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस मांग पर विचार करेगी। उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद में वर्ष 1989 में राजीव गांधी सरकार ने लद्दाख के प्रमुख समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया। पिता की राह पर बेटे का आंदोलन? अपने पिता के विपरीत सोनम वांगचुक ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी। वह एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं। उन्होंने लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और आइस स्तूप जैसी नई पहल के कारण दुनिया भर में पहचान बनाई। लेकिन उन्होंने अपने पिता से एक बात जरूर अपनाई कि भूख हड़ताल लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
