Supreme Court: टिकट न मिलने पर भी देना होगा रेल हादसे का मुआवजा, अदालत ने बदला HC का फैसला; दिए ये आदेश
इससे पहले ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट ने महिला के दावे को यह कहकर खारिज कर दिया था कि हादसे के बाद उनके पति के पास
इससे पहले ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट ने महिला के दावे को यह कहकर खारिज कर दिया था कि हादसे के बाद उनके पति के पास टिकट नहीं मिला था। इसलिए उन्हें वैध यात्री नहीं माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि रेलवे कानून एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या उदार होनी चाहिए, न कि संकीर्ण।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे कानून की धारा 124ए 'बिना गलती के जिम्मेदारी' (नो-फॉल्ट लायबिलिटी) के सिद्धांत पर काम करती है। इसका उद्देश्य हादसे के शिकार लोगों को बिना किसी लापरवाही के सबूत के जल्द मुआवजा देना है।
कोर्ट ने कहा कि केवल टिकट न मिलने से किसी यात्री का दर्जा अवैध नहीं हो जाता। दावेदार शुरुआत में एक हलफनामे (एफिडेविट) के जरिए अपनी बात रख सकता है। इसके बाद दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की होती है।यह मामला नवंबर 2015 का है, जब चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद जाते समय अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिर गए थे। हादसे के बाद उनका बैग गायब हो गया था, जिसमें टिकट रखा था। कोर्ट ने वकील श्वेता प्रियदर्शिनी के माध्यम से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
ऐसा न करने पर याचिका दायर करने की तारीख से 8 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ के कारण लगातार हादसे हो रहे हैं। रेलवे के पास सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के नियम हैं, लेकिन उन्हें ठीक से लागू करना एक चुनौती है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि रेलवे में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने से सुरक्षा बेहतर होगी और युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि केवल रेलवे को जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। यात्रियों की भी अपनी सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी है।
लोग अक्सर चलती ट्रेन पकड़ने जैसी जल्दबाजी करते हैं और अपनी जान जोखिम में डालते हैं। व्यावहारिक कारणों से ऊपर उठकर जीवन की रक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।कोर्ट ने रेलवे मैनुअल में इस्तेमाल होने वाले शब्द 'सेकंड-क्लास पैसेंजर' (द्वितीय श्रेणी का यात्री) पर भी आपत्ति जताई। कोर्ट ने सुझाव दिया कि इस शब्द से वर्ग भेद की भावना आती है। इसलिए इस वर्गीकरण को यात्री के बजाय कोच (डिब्बे) से जोड़ा जाना चाहिए, जैसे 'सेकंड-क्लास कोच'। यह बदलाव समानता और सम्मान के संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल होगा।
