'अटूट श्रद्धा के महाप्रभु जगन्नाथ, विशाल आंखें सब पर बरसाती हैं समान कृपा', बोलीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
मेरे पास दिन-रात रहते हैं महाप्रभु परमेश्वर,यह बात याद कर हृदय में पूजूंगा उन्हें निरंतर।मैं कुछ समझने-बूझने की उम्र में पहुंचने तक जगन्नाथजी को जानने
मेरे पास दिन-रात रहते हैं महाप्रभु परमेश्वर,यह बात याद कर हृदय में पूजूंगा उन्हें निरंतर।मैं कुछ समझने-बूझने की उम्र में पहुंचने तक जगन्नाथजी को जानने लगी थी। हमारे घर में अक्सर जगन्नाथजी की चर्चा होती थी। गांव के वातावरण, विद्यालय की प्रार्थनाओं और घर की धार्मिक परंपराओं ने मेरे मन में श्रीजगन्नाथ के प्रति गहन आस्था का संस्कार दिया। स्कूल में भक्त सालबेग की ‘आहे नीड़ो शोइड़ो’ प्रार्थना गाई जाती थी। शिक्षक बताते थे, पुरी में बड़ा मंदिर है, इतना बड़ा मंदिर और कहीं नहीं है! मंदिर में जगन्नाथजी अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ पूजे जाते हैं। जगन्नाथजी का रंग काला है, आंखें गोल-गोल हैं। सुभद्राजी का रंग पीला है, बलभद्र चांदनी फूल की तरह सफेद है। वह छवि एक बार देख लेने के बाद फिर भुलाए नहीं भूलती। यह भी कहते थे, जगन्नाथ हैं ‘महाप्रभु’, उनका प्रसाद ‘महाप्रसाद’ है, उनका मंदिर ‘बड़ा मंदिर’ है, उनका पथ ‘विशाल पथ’ (बोड़ो दांडो) है, और उनका समुद्र ‘महोदधि’ है।
भुवनेश्वर में पढ़ाई के दौरान पहली बार पुरी जाकर महाप्रभु के दर्शन किए। विशाल श्रीमंदिर, चतुर्धा विग्रह और रथयात्रा की दिव्यता ने मेरे हृदय पर अमिट छाप छोड़ी।क्या उनकी रथयात्रा भुलाई जा सकती है? बारह महीने में तेरह पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं श्रीक्षेत्र में, लेकिन रथयात्रा की छटा तो निराली होती है। पूरे वर्ष भक्तगण यहां आकर महाप्रभु का दर्शन करते हैं। किंतु वर्ष में एक बार महाप्रभु अपने भव्य मंदिर से बाहर विशाल पथ पर आते हैं। भक्तों को दर्शन देते हैं। तीन रथ पर तीन ठाकुर बैठकर चक्रराज सुदर्शन के साथ गुंडिचा मंदिर की ओर यात्रा करते हैं। वहां सात दिनों तक रहकर वापस लौट आते हैं। महाप्रभु का यह महापर्व अतुलनीय है। मेरे जीवन के हर उत्थान-पतन में महाप्रभु ही मेरे संबल रहे हैं। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार घोषित होने पर भी सबसे पहले मैंने उन्हीं का स्मरण किया और उनके आशीर्वाद की प्रार्थना की।
शपथ ग्रहण से लेकर अपने प्रथम संबोधन तक मुझे निरंतर उनकी उपस्थिति और कृपा का अनुभव होता रहा।राष्ट्रपति बनने के बाद जब लंबे समय तक पुरी नहीं जा सकी, तो मन व्याकुल रहा। अंततः 10 नवंबर, 2022 को पुरी पहुंचने का अवसर मिला। बड़दांड पर पहुंचते ही मैंने प्रोटोकॉल त्यागकर नंगे पांव श्रीमंदिर तक चलने का निश्चय किया। श्रीमंदिर लगभग दो किमी दूर था। मंदिर के नीलचक्र और पतित पावन-ध्वज को देखते हुए मैं आगे बढ़ती चली गई। सिंहद्वार पर पहुंचकर पावन धूल में साष्टांग प्रणाम किया और गर्भगृह में महाप्रभु के दर्शन कर भाव-विभोर हो उठी।राष्ट्रपति बनने के बाद जब लंबे समय तक पुरी नहीं जा सकी, तो मन व्याकुल रहा। अंततः 10 नवंबर, 2022 को पुरी पहुंचने का अवसर मिला। बड़दांड पर पहुंचते ही मैंने प्रोटोकॉल त्यागकर नंगे पांव श्रीमंदिर तक चलने का निश्चय किया।
श्रीमंदिर लगभग दो किमी दूर था। मंदिर के नीलचक्र और पतित पावन-ध्वज को देखते हुए मैं आगे बढ़ती चली गई। सिंहद्वार पर पहुंचकर पावन धूल में साष्टांग प्रणाम किया और गर्भगृह में महाप्रभु के दर्शन कर भाव-विभोर हो उठी।मेरे लिए श्रीजगन्नाथ केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि समता, करुणा और सेवा के प्रतीक हैं। उनकी सदैव जागृत, विशाल आंखें समस्त मानवता पर समान कृपा बरसाती हैं। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने समाज के प्रत्येक वर्ग की सेवा को अपना धर्म माना है। आज भी मेरी यही प्रार्थना है कि महाप्रभु का आशीर्वाद सदा मुझ पर, मेरे देश और समस्त मानवता पर बना रहे।
