Lucknow, India

बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया:कुमार विश्वास बोले- वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था

Published 29 May 2026 · world

बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया बशीर बद्र ने 700 गजल, नज्म और 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर

बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया बशीर बद्र ने 700 गजल, नज्म और 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर लंबे समय से बीमार थे और याददाश्त भी खो चुके थे। शाम को बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख. पद्मश्री और साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए बशीर ने करीब 700 गजलें और नज्में जबकि 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया था। इसमें सालों की जमा-पूंजी, डिग्रियां, किताबें और यादें राख हो गई थीं। इसके बाद वे भोपाल में आकर बस गए थे। उन्होंने इसी सदमे में शायरी कही- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था बशीर बद्र के निधन पर देश-प्रदेश के शायर और कवियों ने दुख जताया है। कुमार विश्वास ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए कहा- मैं बहुत कम लोगों के लिए यह कहता हूं कि उन्होंने भाषा को बदल दिया। बशीर बद्र साहब उन गिने-चुने लोगों में थे। उन्होंने सिर्फ गजल नहीं लिखी, उन्होंने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा- बशीर साहब से मेरा रिश्ता तीन दशक से ज्यादा का था। पहले मैं उन्हें एक श्रोता की तरह सुनता था, फिर एक साथी कवि की तरह उनके साथ मंच साझा करने लगा।

हम दोनों का रिश्ता मेरठ से था, इसलिए एक अपनापन हमेशा महसूस होता था। बाद में जब वे कुछ अप्रिय परिस्थितियों के कारण भोपाल आकर बस गए, तब भी मुलाकातों और मुशायरों का सिलसिला चलता रहा। मैंने उन्हें हमेशा एक बड़े आदमी और बड़े शायर की तरह देखा। वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था। बशीर बद्र भारतीय गजल के गौतम बुद्ध थे। जैसे भगवान बुद्ध ने कठिन आध्यात्म को पाली और प्राकृत जैसी लोकभाषाओं में उतारकर आम आदमी तक पहुंचाया, वैसे ही बशीर साहब ने बड़ी से बड़ी बात को इतनी सादगी से कहा कि वह सीधे लोगों के दिल में उतर गई। उनकी शायरी में कोई दिखावा नहीं था। चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं थी, पर हर शेर खुद एक चमत्कार बन जाता था। संसद-विधानसभाओं में चले जाइए, अखबारों में देख लीजिए, सड़कों के नारों में सुन लीजिए- बशीर बद्र मौजूद मिलेंगे। डॉ. बशीर बद्र ने भारत के अलावा अमेरिका, पाकिस्तान और ब्रिटेन में भी मुशायरों में शिरकत की। उनका शेर भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बना कुमार विश्वास ने कहा, ‘बशीर बद्र का शेर- दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बन गया। दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते थे, अगले दिन यही शेर अखबारों में छपा होता। यह शेर न जाने कितने मौकों पर कहा गया- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो... न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।’ उन्होंने बताया- मुझे याद है कि मीना कुमारी जैसी बड़ी अदाकारा ने इसे अपनी डायरी में लिखा था। सोचिए, एक शेर किताबों से निकलकर जिंदगी का हिस्सा बन जाए, इससे बड़ी बात किसी शायर के लिए क्या होगी?

बशीर साहब अच्छे शायर होने के साथ बहुत पढ़े-लिखे भी थे। उन्होंने पीएचडी की थी। उनमें एक प्रोफेसराना ठहराव था। बात करते थे तो लगता था जैसे कोई बहुत तहजीब वाला आदमी अपने इल्म को बहुत सलीके से आपके सामने रख रहा है। अपनी शायरी में हमेशा जिंदा रहेंगे बशीर बद्र कुमार विश्वास ने आगे बताया- मुझे भोपाल राजभवन का एक मुशायरा याद है। दो बड़े शायरों के बीच बहस बढ़ गई थी। माहौल खराब हो सकता था। लेकिन बशीर साहब ने जिस शालीनता से स्थिति संभाली, वह सिर्फ बड़े शायर का नहीं, बड़े इंसान का भी परिचय था। उनके आखिरी साल आसान नहीं थे। बीमारी तकलीफदेह थी। पर मैं यहां खास तौर पर डॉ. राहत बद्र का जिक्र करना चाहूंगा। जिस समर्पण और प्रेम से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह प्रेम की पराकाष्ठा है। आज के समय में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। मुझे लगता है कि किसी शायर की असली मौत तब होती है जब उसके शेर लोगों की जिंदगी से चले जाएं। बशीर बद्र साहब के साथ ऐसा कभी नहीं होगा। वे अपने अशआर (कई सारे शेर) में हमेशा जिंदा रहेंगे। जब तक लोग मोहब्बत करेंगे, रिश्तों को बचाने की कोशिश करेंगे, टूटने के बाद भी मुस्कुराना सीखेंगे... तब तक बशीर बद्र जिंदा रहेंगे। बशीर बद्र के शेर- उजाले अपनी यादों के…लिखी ये तख्ती उनके घर की दीवार पर लगी है। अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे... प्रसार भारती के चेयरमैन और मशहूर कवि प्रसून जोशी ने बशीर बद्र के लिए खास तौर पर लिखी कविता दैनिक भास्कर से साझा की है… अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे यहां एक चोट रखने दे, वहां एक घाव भरने दे यहीं कागज पे ये अल्फ़ाज़ सारे सूख जाएंगे ज़रा सा फैल जाने दे, ज़रा बूंदें बिखरने दे अभी अंगूर में हूं और मुझे ख़ामोश रहना है सुराही में ज़रा शीशों में तू मुझको उतरने दे कहां बुझने का डर मुझको, मैं कोई शमा थोड़े हूं ज़रा सी ज़ुल्फ़ हूं मुझको तू झोंकों से संवरने दे सुनी हैं धड़कनें उसकी कई चुपचाप कानों से यही उम्मीद है शायद मुझे बांहों में मरने दे सुने तू बैठ कर मुझको नहीं ऐसी तमन्ना है मैं हूं ट्रक पर लिखा एक शेर, तू मुझको गुज़रने दे ये खबरें भी पढ़ें… शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह डॉ.

बशीर बद्र (91) नहीं रहे। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। उनको शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। पढ़ें पूरी खबर… हमें चूल्हा जलाना नहीं आता, आप बनाओ चाय आधुनिक उर्दू गजल के बेमिसाल शायर के इंतकाल के बाद शोक की लहर है। उनके जाने के साथ न सिर्फ एक शायर ही नहीं गया, बल्कि एक ऐसा इंसान भी चला गया, जिसने अपनी शायरी से आम आदमी को सोचने पर मजबूर किया। पढ़ें पूरी खबर…

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