अनश्वर: सत्य, अहिंसा, करुणा और ईश्वर के जीवंत प्रतीक दलाई लामा
आपने इस धरती पर सत्य, अहिंसा,करुणा, संवेदना और ईश्वर के जीवंत प्रतीक को देखा है? क्या आप अपने जीवन में ऐसी किसी आध्यात्मिक शख्सियत से
आपने इस धरती पर सत्य, अहिंसा,करुणा, संवेदना और ईश्वर के जीवंत प्रतीक को देखा है? क्या आप अपने जीवन में ऐसी किसी आध्यात्मिक शख्सियत से मिले हैं जिनको देखने मात्र से आपके मन में आदर का भाव उत्पन्न होता. क्या आप 88 साल के किसी ऐसे बुजुर्ग से मिले हैं जिसकी त्वचा पर बच्चों जैसी चमक, जिसके चेहरे पर वैसी ही मुस्कान और जिसके हृदय में केवल और केवल प्रेम का अथाह सागर गोते लगाता हो. जी हां, एक ऐसी शख्सियत आज भी इस धरती पर हैं, और उनका नाम है दलाई लामा. 'अनश्वरः चौदहवें दलाई लामा की जीवनी' डॉ अरविंद यादव ने लिखी है. यह परम पावन के जीवन पर हिंदी में लिखी हुई पहली मौलिक और प्रमाणिक जीवनी है. इस जीवनी को दलाई लामा का आशीर्वचन तो हासिल हुआ ही; भारतीय प्रज्ञा, संस्कृति और सभ्यता के प्रख्यात चिंतक डॉ कर्ण सिंह ने इसकी प्रस्तावना लिखी है. अरविंद के जीवन की भी यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति है; इस लिहाज से कि 20 से अधिक पुस्तकें लिखने के बाद भी उन्हें जो सुकून इस पुस्तक को लिखने से हुआ,. वह संभवतः किसी दूसरी पुस्तक को लिखने में नहीं हुआ था. अरविंद की ख्याति एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार के रूप में रही है. अंग्रेजी, हिंदी, तेलुगु इन भाषाओं पर वह समान रूप से अधिकार रखते रहे हैं और जीवनीकार के रूप में भी उनकी ख्याति रही है. देश के जानेमाने चिकित्सकों पर, उद्योगपतियों पर, पुस्तकें लिखने के अलावा उन्होंने गायिका हेमलता की जीवनी भी लिखी थी. ‘अनश्वर उनके तीन वर्ष से अधिक के प्रयासों और शोध का प्रतिफल है. यह पुस्तक केवल एक उत्कृष्ट जीवनी ही नहीं है, बल्कि एक साहित्यिक कृति से आगे बढ़, तिब्बती बौद्ध धर्म, आधुनिक विश्व इतिहास, वैश्विक कूटनीति, तिब्बत-चीन-भारत संबंध और तिब्बत की संस्कृति को भी समझाती है. पुस्तक परम पावन दलाई लामा के जीवन के उन पहलुओं के बारे में भी बात करती है, जो इस से पहले कहीं उजागर नहीं हुए थे. पुस्तक यह बताती है कि तिब्बत के उत्तर-पूर्व के तकछेर गांव के एक साधारण परिवार में पैदा हुआ ल्हामो दोनडुब नाम का एक नन्हा सा बालक, किस तरह से आध्यात्मिक तिब्बत लामाओं और धर्म गुरुओं की खोज के बाद 14वें दलाई लामा के रूप में न केवल स्थापित हुए बल्कि उनके किसी भी पूर्ववर्ती दलाई लामा को वह संघर्ष नहीं करना पड़ा, वह सब कुछ नहीं झेलना पड़ा, जो परम पावन दलाई लामा को अपने जीवन काल में देखना पड़ा. यह पुस्तक विश्व इतिहास, विश्व राजनीति, महाशक्तियों की क्रूरता और भारतीय संस्कृति की समरसता, सहिष्णुता, भाईचारा की भी बात करती है. तिब्बत की संस्कृति, तिब्बत की कला, तिब्बत का इतिहास, तिब्बत की भाषा, तिब्बत का धर्म यह सब तो इस पुस्तक में है ही. इस पुस्तक में परम पावन के करुणामय विचारों को भी रखा गया है. पुस्तक पांच अध्यायों में बटी है और ये पांच खंड अपने आप में पांच पुस्तकों का प्रतीक हैं, पांच पुस्तकों के प्रतिनिधि हैं. पहला खंड तकछेर गांव के उस बच्चे के पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करती है, उनके जन्म की बात करती है और उस दौरान परम पावन दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में जो कुछ संकेत थे, प्राकृतिक संकेत, आध्यात्मिक संकेत, धार्मिक संकेत उनकी बात करती है. पुस्तक के इस भाग का नाम है- सपनों संकेतों और आस्था की यात्रा: दलाई लामा की पहचान. इसमें कुल आठ अध्याय हैं जिसमें तकछेर गांव की बात है, जहां हर दिल में करुणा थी. हर घर में शांति थी. तूफान की आहट की तरह भावी दलाई लामा के जन्म के समय किस तरह से बादलों के बीच इंद्रधनुष की छाया उनके घर की छत तक पहुंच चुकी थी; और किस तरह से धरती ने एक तरह से उत्फुल्लता जताई थी. मां की गोद से ही किस तरह से उनके सपनों ने उड़ान भरी, और जन्म के साथ ही उनमें आध्यात्मिकता के वे लक्षण दिखाई देने लगे, ऐसे चिह्न, ऐसे संकेत, ऐसे गुण जो 14वें दलाई लामा के रूप में उनके चयन का आधार बने.
