केरलम- डॉक्टर की सैलरी ₹20 हजार, इतनी ही सफाईकर्मी की:जरूरत से 10 गुना ज्यादा डॉक्टर; आईएमए बोला- 66% डॉक्टरों की हालत बंधुआ मजदूर जैसी
केरलम का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर देश में सबसे मजबूत माना जाता है, लेकिन वहां डॉक्टरों को दिक्कत हो रही है। निजी अस्पतालों में एक एमबीबीएस जूनियर
केरलम का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर देश में सबसे मजबूत माना जाता है, लेकिन वहां डॉक्टरों को दिक्कत हो रही है। निजी अस्पतालों में एक एमबीबीएस जूनियर डॉक्टर 12 से 24 घंटे की ड्यूटी के बदले महज ₹20 हजार कमा पा रहा है। यह वेतन वहां के सफाईकर्मी के बराबर है। दरअसल, केरलम हर साल 7 हजार से ज्यादा डॉक्टर तैयार कर रहा है, जबकि जरूरत 600 से 700 की है। हेल्थकेयर में इसे 'ओवरफ्लडिंग' कहते हैं। राज्य में इतने डॉक्टरों को सरकारी अस्पतालों में एडजस्ट करने की व्यवस्था ढह चुकी है। इसलिए कई जूनियर डॉक्टर या तो बेरोजगार हैं या निजी अस्पतालों में सफाईकर्मियों के बराबर वेतन पर नौकरी कर रहे हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने सर्वे में बताया था कि केरलम के 82% डॉक्टरों को गलत वेतन मिल रहा है। 81% डॉक्टर बंधुआ मजदूरी जैसी स्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उनकी पढ़ाई में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। मंत्री बोले- निजी अस्पतालों को कुछ नहीं कह सकते इस सर्वे पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन का कहना है कि निजी अस्पताल स्वायत्त संस्थाएं हैं, इसलिए इनके आंतरिक वेतन ढांचे पर दखल नहीं दे सकते। कोई 1 करोड़ खर्च करने के बाद भी बेरोजगार तो किसी को वेतन नहीं, दो केस केस-1ः 24 घंटे काम, पर वेतन बहुत कम भास्कर ने इस संबंध में तिरुवनंतपुरम की 26 वर्षीय डॉ.
श्री लक्ष्मी से बात की। उन्होंने बताया कि सरकारी कॉलेज में सीट न मिलने पर प्राइवेट सेल्फ-फाइनेंस कॉलेज से 1 करोड़ से अधिक खर्च कर एमबीबीएस किया। डिग्री के बाद एक प्राइवेट अस्पताल में 2 साल जूनियर डॉक्टर के रूप में काम किया। उस समय हर दिन 12 से 24 घंटे काम करने के बदले सिर्फ 20,000 रु. महीना मिलता था। मानसिक और शारीरिक शोषण से तंग आकर नौकरी छोड़ दी। विडंबना देखिए कि मेरे इस्तीफे के तुरंत बाद उस कम वेतन वाली नौकरी के लिए भी सैकड़ों डॉक्टरों की कतार लग गई। केस-2ः सरकारी नौकरी है, पर वेतन नहीं कोच्चि की 28 साल की डॉ.
देविका कहती हैं कि नीट में बेहतरीन स्कोर के दम पर सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिली। एमबीबीएस के बाद 4 साल पीजी की तैयारी की, लेकिन सफल नहीं हुई। स्पेशलाइजेशन के बिना करियर टिकना मुश्किल है, इसलिए मैंने सरकार के फैमिली हेल्थ सेंटर में 56 हजार रु. की 'अस्थायी' नौकरी जॉइन की। यहां मरीजों की भीड़ ज्यादा है, लेकिन निजी अस्पतालों जैसा शोषण नहीं है। लेकिन, पिछले चार महीने से वेतन नहीं मिल पा रहा। इसलिए मैंने यूरोप या गल्फ देशों में नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी है।