चिंताजनक: हॉटस्पॉट जिलों में मलेरिया बड़ी चुनौती, सरकार की बढ़ी मुश्किलें; आदिवासी इलाकों में फैल रहा संक्रमण
सरकार का लक्ष्य 2027 तक देश में स्थानीय मलेरिया संक्रमण को पूरी तरह खत्म करना और 2030 तक डब्ल्यूएचओ से मलेरिया उन्मूलन का प्रमाणपत्र हासिल
सरकार का लक्ष्य 2027 तक देश में स्थानीय मलेरिया संक्रमण को पूरी तरह खत्म करना और 2030 तक डब्ल्यूएचओ से मलेरिया उन्मूलन का प्रमाणपत्र हासिल करना है। लेकिन मानसून के बीच देश के कई राज्यों से आ रहे मलेरिया के मामले सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।सबसे गंभीर स्थिति झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में है, जहां सेरेब्रल मलेरिया से पहले चार बच्चों की मौत हुई और बाद में मृतकों की संख्या बढ़कर छह तक पहुंच गई।
इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग अभियान चलाया। करीब तीन हजार लोगों की जांच में 150 से अधिक संक्रमित मिले। लगातार नए मरीज सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के साथ उपचार, निगरानी और रोकथाम व्यवस्था की समीक्षा की। असम के बोडोलैंड क्षेत्र के तमुलपुर जिले के चाय बागानों में एक महीने के भीतर 95 मलेरिया मरीज मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने विशेष अलर्ट जारी किया।स्वास्थ्य मंत्रालय ने नेशनल फ्रेमवर्क फॉर मलेरिया एलिमिनेशन (2016-2030) और नेशनल स्ट्रैटेजिक प्लान (2023-2027) के तहत चरणबद्ध रणनीति बनाई है।
इसके तहत 2027 तक स्थानीय मलेरिया संक्रमण शून्य करने की तैयारी है। इसके बाद 2030 तक डब्ल्यूएचओ से मलेरिया उन्मूलन का प्रमाणपत्र प्राप्त करना है। 160 से अधिक जिलों में स्थानीय संक्रमण पहले ही समाप्त होने का दावा किया जा रहा है। 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वार्षिक परजीवी संक्रमण दर (एपीआई) प्रति हजार आबादी पर एक से नीचे पहुंच चुकी है। इंटेंसिफाइड मलेरिया एलिमिनेशन प्रोजेक्ट (आईएमईपी-3) के तहत 12 राज्यों के 159 उच्च जोखिम वाले जिलों पर विशेष फोकस किया जा रहा है।राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार, देश के करीब 80 प्रतिशत मलेरिया के मामले केवल 20 प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी, वन और दुर्गम क्षेत्रों से आते हैं।
यानी भारत में अब मलेरिया पूरे देश की समस्या नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा हॉटस्पॉट जिलों की बीमारी बन गया है। यही जिले 2030 के लक्ष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं।
