पंजाब कांग्रेस में वड़िंग-चन्नी की लड़ाई, पावरफुल दिल्ली हुई:भूपेश बघेल नए पावर सेंटर; टिकट के लिए अब नेताओं की दिल्ली दौड़ होगी
पंजाब कांग्रेस में पिछले 5 दिनों तक चले सियासी घटनाक्रम का सबसे बड़ा नतीजा न तो राजा वड़िंग की जीत है और न ही चरणजीत
पंजाब कांग्रेस में पिछले 5 दिनों तक चले सियासी घटनाक्रम का सबसे बड़ा नतीजा न तो राजा वड़िंग की जीत है और न ही चरणजीत सिंह चन्नी की हार। असली बदलाव यह है कि पार्टी के भीतर फैसलों का केंद्र पहले से ज्यादा दिल्ली हो गया है। चन्नी खेमे ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग रखी, वड़िंग अपने पद पर कायम रहे, लेकिन अंतिम फैसला किसी गुट ने नहीं, बल्कि हाईकमान ने लिया। पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने दोनों पक्षों की बातें सुनकर साफ कर दिया कि सभी नेताओं की राय दिल्ली तक जाएगी और टिकट जीतने की क्षमता के आधार पर तय होंगे। साथ ही यह भी साफ हो गया कि पंजाब कांग्रेस के नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं होगा। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो इस पूरे घटनाक्रम ने हाईकमान की भूमिका और मजबूत कर दी है। जबकि, पंजाब के नेताओं की अगली राजनीतिक लड़ाई अब दिल्ली में प्रभाव बनाने की होगी। वड़िंग को क्या मिला: कुर्सी बची, लेकिन परीक्षा अभी बाकी पिछले एक सप्ताह से प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनी रही। इसके बावजूद हाईकमान ने 23 जिला अध्यक्ष राजा वड़िंग के गुट के होने की वजह से नेतृत्व परिवर्तन से इनकार कर दिया।
इससे राजा वड़िंग को तत्काल राहत मिली और उनका संगठनात्मक अधिकार बरकरार रहा। हालांकि, इस विवाद ने यह भी दिखा दिया कि पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को लेकर सवाल मौजूद हैं। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखना और यह साबित करना होगी कि मौजूदा नेतृत्व में कांग्रेस 2027 का चुनाव मजबूती से लड़ सकती है। चन्नी को क्या मिला: बात सुनी गई, राजनीतिक वजन भी दिखा पूर्व CM चरणजीत सिंह चन्नी नेतृत्व परिवर्तन नहीं करा सके, लेकिन यह जरूर साबित कर दिया कि उन्हें नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। उनकी नाराजगी के बाद अलग बैठक हुई, उनके तर्क सुने गए और प्रभारी ने भरोसा दिया कि पूरी रिपोर्ट हाईकमान तक जाएगी। इससे यह संदेश गया कि पंजाब कांग्रेस में चन्नी अब भी सबसे प्रभावशाली नेताओं में हैं। खासकर, करीब 32% दलित वोट बैंक को कांग्रेस नाराज नहीं करना चाहती। हालांकि, चन्नी को भी यह स्पष्ट संकेत मिला कि केवल राजनीतिक दबाव से संगठनात्मक फैसले नहीं बदलेंगे। हाईकमान सबसे ताकतवर कैसे हुआ? इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ केंद्रीय नेतृत्व को मिला। एक तरफ वड़िंग अपने समर्थकों के साथ थे, दूसरी तरफ चन्नी और रंधावा नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे थे।
लेकिन, अंतिम फैसला न चंडीगढ़ में हुआ और न किसी गुट के दबाव में। सभी पक्षों को अपनी बात हाईकमान तक पहुंचानी पड़ी। इससे साफ संकेत गया कि पंजाब कांग्रेस में संगठन, टिकट और बड़े राजनीतिक फैसलों की अंतिम चाभी अब भी दिल्ली के पास ही है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस घटनाक्रम ने केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ और मजबूत कर दी है। भूपेश बघेल नए पावर सेंटर क्यों बने? 5 दिनों के पूरे घटनाक्रम में सबसे सक्रिय भूमिका पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल की रही। उन्होंने पहले नेताओं से अलग-अलग बातचीत की। फिर असंतुष्ट खेमे की बैठक की और अंत में दोनों पक्षों को एक संदेश दिया कि अंतिम रिपोर्ट हाईकमान के पास जाएगी। टिकट वितरण, नेताओं के प्रदर्शन, संगठन की स्थिति और चुनावी तैयारियों का फीडबैक अब उनके जरिए ही दिल्ली पहुंचेगा। ऐसे में पंजाब कांग्रेस में फिलहाल नेताओं और हाईकमान के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उनकी भूमिका उभरती दिखाई दे रही है। अब नेताओं की दिल्ली दौड़ क्यों बढ़ेगी? बैठक के बाद यह लगभग साफ हो गया कि 2027 की तैयारी में सबसे अहम फैसले, जैसे; टिकट, संगठनात्मक बदलाव और चुनावी रणनीति, दिल्ली में तय होंगे। ऐसे में विधायक, पूर्व विधायक, जिला अध्यक्ष, टिकट के दावेदार और विभिन्न गुटों के नेता अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता का संदेश पहले प्रभारी और फिर हाईकमान तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे।