सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने फेंके कागज: CJI को कहे अपशब्द, फिर भी जजों ने क्यों नहीं की कोई कार्रवाई?
याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने सुप्रीम कोर्ट के जजों को सरेआम 'न्यायिक नौकर' कहा। कोर्ट रूम से बाहर निकालते समय याचिकाकर्ता ने देश के मुख्य न्यायाधीश
याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने सुप्रीम कोर्ट के जजों को सरेआम 'न्यायिक नौकर' कहा। कोर्ट रूम से बाहर निकालते समय याचिकाकर्ता ने देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपशब्द कहे। गुस्से से लाल याचिकाकर्ता ने केस से जुड़ी फाइलें अदालत के भीतर हवा में उड़ा दीं। जजों ने याचिकाकर्ता की दिमागी हालत को भांपते हुए उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। पीठ ने बिना किसी भेदभाव के मामले को कानून के दायरे में परखा और याचिका को खारिज कर दिया। यह पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का नाम प्रबल प्रताप है। वह इस मामले में खुद पैरवी करने कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई शुरू होते ही वह जजों पर चिल्लाने लगा।
उसने जजों को 'जुडिशियल सर्वेंट' (न्यायिक नौकर) कहना शुरू कर दिया। उसने दावा किया कि वह खुद 'संप्रभु' यानी सबसे ऊपर है।प्रबल प्रताप ने जजों को रौब दिखाते हुए कहा, 'मिस्टर जुडिशियल सर्वेंट, मैं आपको आदेश देता हूं। आप लखनऊ के एसीपी विकास नगर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करें।' इस बात पर जस्टिस विश्वनाथन चौंक गए। उन्होंने पूछा, 'क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?' इसके बाद माहौल और खराब हो गया। याचिकाकर्ता ने गुस्से में केस के सारे कागज हवा में फेंक दिए। जब सुरक्षाकर्मी उसे बाहर ले जाने लगे, तो उसने सीजेआई के लिए बेहद गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया।इतनी बड़ी बदतमीजी के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया। पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना का केस दर्ज नहीं किया।
कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में इसकी वजह भी साफ बताई है। जजों ने जानबूझकर कोई कानूनी एक्शन नहीं लेने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति और हालत को देखते हुए हम उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते हैं।अदालत ने उस व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर सहानुभूति दिखाई। जजों ने इस हंगामे से अपना ध्यान नहीं भटकाया। उन्होंने ठंडे दिमाग से केस की कानूनी मेरिट को देखा। कोर्ट को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में कोई खामी नहीं मिली। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसकी विशेष अनुमति याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इसके बाद देश के बड़े वकीलों ने जजों के व्यवहार की खूब सराहना की।
सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील डॉ. अलख आलोक श्रीवास्तव ने इसे 'न्यायिक बड़प्पन' का अनोखा उदाहरण माना। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि जस्टिस केवी विश्वनाथन का यह रूप सच में प्रेरणा देने वाला है।हालांकि, उन्होंने याचिकाकर्ता की इस हरकत की कड़ी आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि अदालतों में देरी की वजह से जनता में गुस्सा है, यह बात समझ आती है। लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत में ऐसा गंदा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि केस पेंडिंग रहने के लिए सिर्फ कोर्ट जिम्मेदार नहीं हैं। यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे ज्यादा जजों की नियुक्ति करें और अदालतों को बेहतर सुविधाएं दें ताकि लोगों को जल्दी न्याय मिल सके।
