SC: 'बच्चों के यौन शोषण की रिपोर्ट न करना भी अपराध', सुप्रीम कोर्ट का प्रधानाध्यापिका को राहत देने से इनकार
क्या है मामला? एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका पर आरोप था कि उन्होंने एक सीनियर छात्र द्वारा आठ साल की छात्रा के साथ दुष्कर्म की शिकायत
क्या है मामला? एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका पर आरोप था कि उन्होंने एक सीनियर छात्र द्वारा आठ साल की छात्रा के साथ दुष्कर्म की शिकायत को दबा दिया। अब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी.विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में स्कूल की प्रधानाध्यापिका को आरोपमुक्त करने का फैसला रद्द कर दिया है। पीठ ने कहा कि अगर किसी स्कूल अधिकारी को बच्चे के यौन शोषण की शिकायत मिलती है तो वे खुद जांच-पड़ताल करके नतीजा निकालकर ये नहीं कह सकते कि कुछ नहीं हुआ।
अधिकारी घटना की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। सुप्रीम कोर्ट में आठ साल की पीड़िता की मां ने अपील दायर की थी। याचिका में अपीलकर्ता ने ट्रायल कोर्ट, गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें स्कूल अधिकारियों, जिनमें प्रधानाध्यापिका, प्रिंसिपल, शिक्षक और हॉस्टल वार्डन शामिल थे, उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया था। पीड़िता ने बताया कि आठवीं कक्षा के एक छात्र ने उसका यौन शोषण किया, जिसकी जानकारी उसने अपनी बहन और स्कूल की प्रधानाध्यापिका को दी थी।
पोक्सो एक्ट की धारा 19(1) के तहत प्रधानाध्यापिका ने मामले की रिपोर्ट पुलिस में करने की बजाय खुद मामले की जांच-पड़ताल की। पूछताछ में आरोपी छात्र ने घटना से साफ इनकार किया। जांच में प्रधानाध्यापिका ने नतीजा निकाला कि कुछ नहीं हुआ था और उन्होंने कथित तौर पर घटना को दबा दिया था। आरोप है कि उन्होंने छात्रों को इस बारे में किसी को भी कुछ न बताने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा अगर किसी स्कूल में अधिकारी को बच्चे के यौन शोषण की शिकायत मिलती है तो वह खुद जांच-पड़ताल करके मामले को रफा-दफा नहीं कर सकते।
अधिकारी घटना की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 19 के तहत घटना की रिपोर्ट ने करने पर पोक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी बनती है, जिसमें छह महीने तक की जेल या जुर्माना दोनों हो सकते हैं।
