नकली नोट में गांधीजी का वाटरमार्क, सिल्वर लाइन भी:एक पेपर पर छपते 500 के 5 नोट, इंडस्ट्री की तरह गैंग में प्रोडक्शन
दैनिक भास्कर एप की स्पेशल सीरीज के पहले पार्ट में आपने ऑन कैमरा नकली नोट माफिया के चेहरे देखे। भास्कर रिपोर्टर ने ग्राहक बनकर पूरे
दैनिक भास्कर एप की स्पेशल सीरीज के पहले पार्ट में आपने ऑन कैमरा नकली नोट माफिया के चेहरे देखे। भास्कर रिपोर्टर ने ग्राहक बनकर पूरे नेटवर्क को एक्सपोज किया। भास्कर की पड़ताल में नकली नोट बनाने वाले एक और गैंग का सच सामने आया। ये गैंग किसी इंडस्ट्री की तरह ही नेटवर्क चला रहा था। प्रोडक्शन, मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का जिम्मा गैंग के अलग-अलग सदस्यों के पास। इनके बनाए नकली नोट में गांधीजी का वाटरमार्क भी होता था। सिल्वर लाइन के लिए खाना पैक करने वाला सिल्वर फॉयल यूज करते थे। 40 लाख से ज्यादा के नकली नोट मार्केट में चला चुके थे। पढ़िए नकली नोट गिरोह और उसके तीन अहम किरदारों की कहानी... विशाल: बिजनेस ठप हुआ तो आया नकली नोट का आइडिया नकली नोट बनाने का मास्टरमाइंड। झारखंड का रहने वाला है। वर्तमान में नोएडा में रह रहा था। पिता का बिजनेस था। पिता की मौत के बाद बिजनेस ठप हो गया। विशाल ने कई काम किए, लेकिन सब में घाटा हुआ। फिर कमीशन पर युवकों को नौकरी लगाने का काम करने लगा। इसी दौरान उसे नकली नोट छापने का आइडिया आया। कंप्यूटर का अच्छा डिजाइनर है। 6 महीने तक खुद ही डमी बनाने पर काम करता रहा। फिर अपने साथ गुलशन बैरवा और संतोष वाल्मीकि को जोड़ लिया। गुलशन बैरवा: दिल्ली में कई जगह नकली नोट चलाए गुलशन बैरवा रोहिणी का रहने वाला है। विशाल के साथ मिलकर 3 साल से रोज देर रात तक असली जैसे नोट छापने की प्रैक्टिस कर रहा था। कई बार डिजाइन बनाए और सैंपल चेक करने बाजार जाता था। नोट की फाइनल डमी तैयार होने के बाद मार्केटिंग का काम संभाला। दिल्ली में कई जगह नकली नोट चलाए। जांच में पता लगा कि अब तक 40 लाख के नकली नोट चला चुके हैं।
संतोष वाल्मीकि: घर पर नोट छापने का पूरा सेटअप संतोष वाल्मीकि फरीदाबाद के बसंतपुर में रहता था। वैसे यूपी के अलीगढ़ का है। पहले ओला बाइक चलाता था। कम्प्यूटर का अच्छा जानकार है। नकली नोट की फाइनल डमी तैयार करने में विशाल की मदद की थी। संतोष के घर पर ही नोट छापने का पूरा सेटअप लगा रखा था। विशाल और संतोष दोनों पिछले 8 साल से अच्छे दोस्त थे। यहां से 23 लाख 37 हजार रुपए के नोट बरामद हुए थे। 11 प्रिंटर व 3 लैपटॉप से बनाते थे नकली नोट, हर नोट का सीरियल नंबर अलग विशाल और संतोष मिलकर नोट की डमी तैयार करते थे। गुलशन मार्केटिंग का काम करता था। एक पेपर पर 500 रुपए के तीन नोट बनाते थे। हर नोट का सीरियल नंबर भी अलग रखते थे। पहले कुछ ही प्रिंटर थे। काम बढ़ने लगा तो 11 कलर प्रिंटर नए ले आए। 10 डाई भी बना रखी थी। नोट प्रिंट करने के लिए नोएडा से पेपर खरीदते थे। लैपटॉप में ही नोट के सीरियल नंबर अलग-अलग रखते थे। आरोपी काफी समय से दिल्ली व नोएडा के बाजार में नोट खपा रहे थे। यूपी में भी नेटवर्क बना लिया था। डाई बनाकर वाटरमार्क बनाते थे, सिल्वर लाइन भी लगाते दौसा सदर थानाधिकारी मुकेश कुमार ने बताया कि नकली नोट को असली दिखाने के लिए एक डाई बनाई थी। इससे नोट के बीच में महात्मा गांधी का वाटर मार्क और 500 रुपए का वाटर मार्क भी बनाते थे। नोट के बीच में एक सिल्वर की लाइन भी बनाते थे। इसे खाना पैक करने वाले सिल्वर फॉइल से बनाते थे। इसे कैंची से काट कर नोट के साइड में चिपका कर गर्म करके लगाते थे। इसे लगाने के बाद नोट बिल्कुल असली की तरह दिखता था। असली नोट की तरह से डाई बनाकर काटते थे।