तमिलनाडु: सीएम विजय के चुनाव को हाईकोर्ट में दी गई चुनौती, जानें क्या लगे आरोप; Aiadmk में फिर बगावत की अटकलें
चुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल किया गया, जो चुनाव आयोग के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है। नामांकन के दौरान दाखिल किए गए फॉर्म-26
चुनाव प्रचार में बच्चों का इस्तेमाल किया गया, जो चुनाव आयोग के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है। नामांकन के दौरान दाखिल किए गए फॉर्म-26 में कथित विसंगतियां हैं। त्रिची और पेरंबूर के हलफनामों में नोटरी से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास बताया गया है। दावा है कि दोनों हलफनामों में ऐसा प्रतीत होता है कि विजय एक ही दिन दो अलग-अलग नोटरी के सामने उपस्थित थे। आयकर बकाया की पूरी जानकारी नहीं देने का आरोप लगाया गया है। सोशल मीडिया प्रचार पर हुए खर्च का सही हिसाब नहीं दिया गया।
चुनाव खर्च तय सीमा से अधिक होने का आरोप लगाया गया है। चर्च और मंदिर परिसर में चुनाव प्रचार करने का आरोप भी लगाया गया है, जिसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत भ्रष्ट आचरण बताया गया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के उम्मीदवार आर. डी. शेखर, जो 2026 के विधानसभा चुनाव में पेरंबूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ चुनाव लड़े थे, ने हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की है। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने मुख्यमंत्री विजय को नोटिस जारी करने का आदेश दिया और मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है।याचिका में मुख्यमंत्री विजय के चुनाव को कई आधारों पर चुनौती दी गई है।
इनमें प्रमुख आरोप हैं-इसी तरह की एक अन्य याचिका तिरुचिरापल्ली पूर्व विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव हारने वाले डीएमके उम्मीदवार इनिगो इरुधयराज ने भी मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ दायर की है।पेरंबूर विधानसभा सीट पर मुख्यमंत्री विजय को 1,20,365 वोट मिले थे, जबकि डीएमके के आर. डी. शेखर को 66,650 वोट प्राप्त हुए थे। विजय ने 53,715 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए 23 अप्रैल 2026 को मतदान हुआ था और 4 मई 2026 को परिणाम घोषित किए गए थे।इधर, एआईएडीएमके प्रमुख एडप्पादी के.
पलानीस्वामी की अध्यक्षता में चेन्नई में आयोजित पार्टी की सलाहकार बैठक में दो विधायकों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी। इस बैठक में पूर्व मंत्री के. सी. वीरमणि और आर्कोट विधायक एस. एम. सुकुमार शामिल नहीं हुए। उनकी गैरमौजूदगी को पार्टी के भीतर असंतोष और संभावित बगावत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
