शरीर में छिपे 'धीमे जहर' को अब पकड़ लेगा नैनो पेप्टाइड आधारित यह सिस्टम
शत्रुघन केशरवानी, जागरण। घर की पुरानी बैटरी, दीवारों का पुराना पेंट, फैक्ट्री का धुआं, दूषित पानी या मिलावटी सामान ये सब कब शरीर में 'धीमे जहर' सीसे (लेड) को पहुंचा देते हैं, इसका पता अक्सर तब चलता है, जब शरीर गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका होता है। यही वजह
शत्रुघन केशरवानी, जागरण। घर की पुरानी बैटरी, दीवारों का पुराना पेंट, फैक्ट्री का धुआं, दूषित पानी या मिलावटी सामान ये सब कब शरीर में 'धीमे जहर' सीसे (लेड) को पहुंचा देते हैं, इसका पता अक्सर तब चलता है, जब शरीर गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका होता है। यही वजह है कि सीसा विषाक्तता (लेड पाइजनिंग) आज पूरी दुनिया में चिंता का बडा कारण बन चुकी है। अब इस खतरे से लड़ने की दिशा में सागर के डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने बड़ी सफलता हासिल की है। विश्वविद्यालय के रसायन विभाग ने एक ऐसा पेप्टाइड बेस्ड नैनो सिस्टम विकसित किया है, जो शरीर में मौजूद जहरीले सीसे को कोशिका स्तर पर खोजकर चमकदार संकेत देगा। खास बात यह है कि यह तकनीक केवल सीसे की पहचान ही नहीं करेगी, बल्कि उसके नुकसान को कम करने की दिशा में भी मददगार साबित हो सकती है। विश्वविद्यालय के इस शोध को रायल सोसायटी आफ केमेस्ट्री के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'नैनो स्केल' में प्रकाशित किया गया है।
शोध की शुरुआत वर्ष 2022 में तब हुई, जब शोध टीम ने यह समझने का प्रयास किया कि सीसा मानव स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित करता है। इसी क्रम में प्रूफ ऑफ प्रिंसिपल के रूप में मानव रेटिना कोशिकाओं पर इसका सफल अध्ययन किया गया। शोध के दौरान टीम ने एक विशेष शार्ट मेटालोपेप्टाइड आधारित प्रणाली विकसित की, जो सीसा आयनों की पहचान, इमेजिंग और विषहरण में सहायक सिद्ध हो सकती है। यह शोध मानव रेटिना कोशिकाओं में सीसा जैसी विषैली भारी धातु के प्रभाव, उसकी इमेजिंग और विषहरण को समझने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया। डॉ. खश्ती बल्लभ जोशी का कहना है कि आज सीसा एक धीमा जहर बन चुका है, जो प्रदूषित पानी, रंग, बैटरियों, औद्योगिक अपशिष्ट व दूषित वातावरण के माध्यम से धीरे - धीरे मानव शरीर में प्रवेश करता है। इसका गंभीर प्रभाव आंखों, मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, किडनी तथा बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से दृष्टि संबंधी समस्याएं, स्मरण शक्ति में कमी तथा न्यूरोलॉ जिकल विकार उत्पन्न हो सकते हैं।
डॉ. जोशी के अनुसार, यह तकनीक दूषित जल में उपस्थित सीसा की पहचान करने में भी सक्षम है, जिसे सामान्य टीडीएस मीटर से पहचानना संभव नहीं होता। यह शोध वर्तमान में टीआरएल -4 से टीआरएल -5 स्तर तक पहुंच चुका है। ऐसे काम करता है यह 'नैनो संग्राहक' आम भाषा में समझें तो विज्ञानियों ने एक बेहद सूक्ष्म 'नैनो संग्राहक' तैयार किया है, जो छोटे प्याले जैसा काम करता है। जैसे ही यह सीसे के संपर्क में आता है, चमकदार संकेत देने लगता है। इससे विज्ञानियों को यह पता चल जाता है कि शरीर की कोशिकाओं में सीसा कहां मौजूद है। यही नहीं, यह नैनो सिस्टम सीसे को अपनी संरचना में बांधकर उसके प्रभाव को कम करने की क्षमता भी रखता है। भविष्य में इलाज का रास्ता खोल सकती है तकनीक शुरुआती परीक्षणों में यह तकनीक मानव रेटिना कोशिकाओं की सुरक्षा में भी उपयोगी दिखाई दी है। विज्ञानियों का कहना है कि इसे अभी दवा कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह खोज भविष्य में ऐसे उपचार विकसित करने का रास्ता जरूर खोल सकती है, जिससे शरीर में मौजूद जहरीले सीसे के असर को कम करने में मदद मिले गी।
शोधार्थी आनंद काउतु, श्रुति शर्मा और सहयोगी विज्ञानियों ने डॉ. खश्ती बल्लभ जोशी के मार्गदर्शन में यह पेप्टाइड बेस्ड नैनो सिस्टम विकसित किया है। इस शोध में आइआइटी गांधीनगर के डॉ. धीरज भाटिया एवं आइआइटी रुड़की के डॉ. पुनीत गुप्ता ने भी सहयोग दिया है। स्वास्थ्य और नैनो तकनीक के क्षेत्र में इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। शोध में पता चला है कि सीसा ऐसा जहर है, जिसका न रंग होता है और न गंध। यही कारण है कि यह चुपचाप शरीर में पहुंचकर नुकसान करता रहता है। बच्चों में इसका असर सबसे अधिक होता है, क्योंकि उनका दिमाग और शरीर विकास की अवस्था में होता है। इससे याददाश्त कमजोर हो सकती है। सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और किडनी, आंखों व दिल पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
