बांकीपुर उपचुनाव: साख, समीकरण और रणनीति की निर्णायक जंग; भाजपा के अभेद्य गढ़ में प्रशांत किशोर का दांव
यह सीट दशकों से भाजपा का मजबूत किला रही है। नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार विधायक रहे हैं जबकि उनसे पहले उनके पिता
यह सीट दशकों से भाजपा का मजबूत किला रही है। नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार विधायक रहे हैं जबकि उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद चार बार इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन के राज्यसभा जाने से खाली हुई इस सीट पर अब पार्टी के सामने गढ़ बचाने की चुनौती है और यह चुनौती सामान्य नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है।
यहां 30 जुलाई को मतदान, 3 अगस्त को नतीजे आएंगे।जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) का चुनावी मैदान में उतरना इस उपचुनाव को असाधारण बनाता है। अब तक पर्दे के पीछे रणनीति गढ़ने वाले पीके पहली बार सीधे जनादेश मांग रहे हैं। यह चुनाव उनके लिए सिर्फ राजनीतिक शुरुआत नहीं बल्कि विश्वसनीयता की निर्णायक परीक्षा है।राजद और कांग्रेस जैसे दलों के सामने यह चुनाव रणनीतिक दुविधा लेकर आया है।
क्या वे प्रशांत किशोर के साथ खड़े होंगे या मुकाबला त्रिकोणीय बनेगा? अगर विपक्ष बिखरा तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। हालांकि, स्थानीय असंतोष और एंटी-इंकंबेंसी ऐसे कारक हैं, जिन्हें विपक्ष भुनाने की कोशिश करेगा।बांकीपुर में नितिन नवीन का व्यक्तिगत प्रभाव और भाजपा का बूथ स्तर तक फैला संगठन इस चुनाव की धुरी है।
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या नितिन का प्रभाव पूरी तरह वोट में ट्रांसफर हो पाएगा।
