Climate Change India: बदल रहा बारिश का मिजाज, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे का खतरा; जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
आईआईटी हैदराबाद और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों ने 1901 से 2022 तक के बारिश के आंकड़ों का अध्ययन किया। यह रिसर्च अर्बन क्लाइमेट जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि देशभर में बारिश का असर एक जैसा नहीं है। एक ही इलाके में मौजूद दो शहरों
आईआईटी हैदराबाद और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों ने 1901 से 2022 तक के बारिश के आंकड़ों का अध्ययन किया। यह रिसर्च अर्बन क्लाइमेट जर्नल में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि देशभर में बारिश का असर एक जैसा नहीं है। एक ही इलाके में मौजूद दो शहरों का मौसम भी अलग दिशा में बदल रहा है। कुछ शहरों में अचानक भारी बारिश बढ़ रही है, जबकि कई जगहों पर मानसूनी बारिश कम होती जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह जलवायु परिवर्तन का सीधा असर है और अब पुराने मौसम के पैटर्न पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है।अध्ययन के मुताबिक, जिन शहरों में अचानक तेज बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, वहां शहरी बाढ़ का खतरा तेजी से बढ़ेगा।
वहीं जिन शहरों में बारिश कम हो रही है, वहां पानी की कमी और सूखे की समस्या गंभीर हो सकती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि पश्चिमी तटीय इलाकों में मानसून कमजोर पड़ता दिखाई दिया है। इसका असर जल उपलब्धता पर पड़ सकता है। कई शहरों में बारिश का समय और मात्रा दोनों बदल रही हैं, जिससे खेती, पेयजल और शहरी जीवन पर असर पड़ रहा है।वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि अब पूरे देश के लिए एक जैसी जलवायु नीति काम नहीं करेगी। जिन शहरों में भारी बारिश बढ़ रही है, वहां मजबूत ड्रेनेज सिस्टम और बाढ़ नियंत्रण योजना बनानी होगी। वहीं जिन इलाकों में बारिश कम हो रही है, वहां जल संरक्षण और पानी बचाने की रणनीति पर ज्यादा काम करना पड़ेगा।
शोधकर्ताओं का कहना है कि हर शहर की जरूरत और मौसम के हिसाब से अलग योजना तैयार करनी होगी। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।शोध में पाया गया कि कुछ दशकों तक मौसम एक जैसा रहता है और फिर अचानक उसका व्यवहार बदल जाता है। ऐसे में केवल पुराने औसत आंकड़ों के आधार पर भविष्य की योजना बनाना खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों ने कहा कि अब मौसम तेजी से बदल रहा है और शहरों को नई परिस्थितियों के हिसाब से तैयार रहना होगा। उन्होंने यह भी माना कि अध्ययन में कुछ सीमाएं थीं, क्योंकि आंकड़े बड़े क्षेत्रों के औसत पर आधारित थे। छोटे इलाकों में होने वाली बहुत तेज बारिश की घटनाएं पूरी तरह दर्ज नहीं हो सकीं।शोधकर्ताओं ने कहा कि पिछले सौ वर्षों में शहरों का तेजी से विस्तार हुआ है।
बड़े पैमाने पर शहरीकरण, कंक्रीट निर्माण और पेड़ों की कटाई ने स्थानीय मौसम को प्रभावित किया है। कई शहरों में गर्मी बढ़ी है और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था कमजोर हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर शहरों की योजना जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई, तो भविष्य में बाढ़ और पानी की कमी जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
