देश की पहली नदी जोड़ो केन-बेतवा लिंक परियोजना कानूनन अवैध:45,000 करोड़ के प्रोजेक्ट की सारी मंजूरियां खत्म; बिना फॉरेस्ट क्लीयरेंस के हो रहा निर्माण
देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट कानूनी और तकनीकी विवादों में घिर गया है। सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया है
देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट कानूनी और तकनीकी विवादों में घिर गया है। सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया है कि फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कई अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं हुआ। इनमें प्रभावित परिवारों के रिहेबिलिटेशन की सबसे अहम शर्त अब भी अधूरी है। नियमों के अनुसार, जरूरी शर्तें पूरी न होने पर प्रोजेक्ट के लिए दोबारा फॉरेस्ट क्लीयरेंस लेना पड़ता है। जिला प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि प्रभावित परिवारों का अब तक पूरा पुनर्वास नहीं हुआ। वहीं, सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की अहम सिफारिशों का भी पूरा पालन नहीं हुआ। इन हालातों में करीब 45 हजार करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। प्रोजेक्ट के कानूनी और तकनीकी विवादों को समझने के लिए भास्कर ने सरकारी दस्तावेजों की जांच की और एक्सपर्ट्स से बातचीत की। इस मामले में वन विभाग के अधिकारियों से पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पन्ना टाइगर रिजर्व का 6,000 हेक्टेयर कोर क्षेत्र होगा जलमग्न केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत बुंदेलखंड के जिलों तक पानी पहुंचाने के लिए दौधन बांध बनाया जा रहा है। इसके निर्माण से पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया का 6,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलमग्न होगा। इस पर्यावरणीय असर को देखते हुए प्रोजेक्ट को दो चरणों में फॉरेस्ट क्लीयरेंस दी गई थी। मई 2017 में स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लीयरेंस तो अक्टूबर 2023 में स्टेज-2 की मंजूरी मिली। दोनों चरणों में पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और प्रभावित लोगों के पुनर्वास से जुड़ी कई जरूरी शर्तें रखी गईं, जिनमें कई समान थीं। सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया है कि इन अनिवार्य शर्तों का पूर्ण पालन नहीं हुआ। आइए समझते हैं कि किन शर्तों का उल्लंघन हुआ और इसका कानूनी और तकनीकी असर क्या है? फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कॉमन शर्तें शर्त-1: जमीन का भौतिक हस्तांतरण और आरक्षित वन घोषित करना 2017 और 2023 में मिली फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कॉमन प्रमुख शर्त थी कि क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए चिह्नित गैर-वन भूमि पहले वन विभाग को भौतिक रूप से सौंपी जाए और भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत उसे 'आरक्षित वन' घोषित किया जाए।
स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लीयरेंस (मई 2017) की शर्त-4 के अनुसार, यह प्रक्रिया स्टेज-2 क्लीयरेंस से पहले पूरी होनी जरूरी थी। यही प्रावधान स्टेज-2 क्लीयरेंस (अक्टूबर 2023) में शर्त-2 के रूप में शामिल किया गया। इसके तहत पन्ना टाइगर रिजर्व के पश्चिम में 6,809 हेक्टेयर गैर-वन भूमि को वन क्षेत्र में शामिल करना था, जिसमें 6,017 हेक्टेयर भूमि को टाइगर रिजर्व का हिस्सा बनाया जाना था। साथ ही, 3 अप्रैल 2024 तक प्रक्रिया पूरी कर इस भूमि को आरक्षित वन घोषित करना अनिवार्य था। जमीनी हकीकत: कागज में हस्तांतरण, लेकिन भौतिक कब्जा नहीं सरकार ने 29 मार्च से 14 जून 2024 के बीच संबंधित गजट नोटिफिकेशन जारी किए। 19 जुलाई 2024 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई प्रोजेक्ट की छठी समीक्षा बैठक में पन्ना टाइगर रिजर्व के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर ने बताया कि भूमि का रिकॉर्ड में हस्तांतरण और म्यूटेशन हो चुका है, लेकिन वन विभाग को अब तक उसका भौतिक कब्जा नहीं मिला। पुनर्वास अधूरा, इसलिए कब्जा नहीं मिल सका भौतिक कब्जा न मिलने की प्रमुख वजह यह है कि कई स्थानों पर प्रभावित परिवारों का पुनर्वास अब तक पूरा नहीं हुआ। इसके कारण लोग भूमि खाली नहीं कर सके और कई सरकारी जमीनों पर अब भी अतिक्रमण है। शर्त-2: जंगल में पावर प्लांट पर रोक, फिर भी निर्माण की तैयारी केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के फॉरेस्ट क्लीयरेंस की दूसरी कॉमन शर्त थी कि मुख्य वन क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार का पावर प्लांट या पावर हाउस नहीं बनाया जाएगा। स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लीयरेंस (मई 2017) की शर्त-13 में जंगल के भीतर पावर प्लांट के निर्माण पर साफ रोक लगाई गई थी। यही प्रावधान स्टेज-2 फॉरेस्ट क्लीयरेंस (अक्टूबर 2023) में शर्त-11 के रूप में दोहराया गया। हकीकत: रोक के बावजूद 78 मेगावाट के पावर प्लांट का प्रस्ताव दस्तावेजों के अनुसार, स्पष्ट प्रतिबंध के बावजूद केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्राधिकरण (KBLPA) पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर 78 मेगावाट क्षमता का पावर प्लांट स्थापित करने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है। पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर के अनुसार, प्रोजेक्ट के आधिकारिक नक्शे में अब भी पावर प्लांट का प्रस्ताव दर्ज है।