'जनता को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा': बॉम्बे हाईकोर्ट की पुलिस को फटकार, पूछा- सत्ता के विरोध पर केस क्यों?
एकल जज जस्टिस माधव जमदार ने मुंबई पुलिस की कड़ी आलोचना की। यह आलोचना सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49 वर्षीय) को इलाके से बाहर
एकल जज जस्टिस माधव जमदार ने मुंबई पुलिस की कड़ी आलोचना की। यह आलोचना सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49 वर्षीय) को इलाके से बाहर करने के आदेश को लेकर थी। सईद सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव हैं। वह नागरिकता कानून में संशोधन और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे केंद्र सरकार के कई फैसलों के खिलाफ रैली और धरने का आयोजन करते रहे हैं।याचिका को देखते हुए जज ने पूछा कि सिर्फ पांच एफआईआर के आधार पर सईद को एक साल के लिए इलाके से बाहर करने का आदेश क्यों दिया गया? इन पांच एफआईआर में अधिकतर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए दर्ज की गई थीं।जज ने कहा, यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है...
वे विरोध नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते-यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हो गए हैं। अगर लोग विरोध करेंगे तो आप उन पर केस लगा देंगे? यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। याचिकाकर्ता ने सिर्फ 'बीजेपी सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं। ऐसे नारों पर लोग विरोध क्यों नहीं कर सकते? सिर्फ ऐसे नारों के लिए इलाके से बाहर करने के आदेश क्यों?जज ने आगे कहा कि पुलिस किसी नागरिक को सिर्फ इसलिए बाहर नहीं कर सकती, क्योंकि उसने सरकार के फैसलों का विरोध किया है। जज ने कहा, पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है, वे जनता के सेवक हैं। मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाने वाला हूं।जस्टिस जमदार ने महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे दल-बदल' पर भी टिप्पणी की।
यह टिप्पणी इसलिए आई, क्योंकि सईद एसडीपीआई पार्टी से जुड़े थे।जज ने कहा, दो दिन पहले एक 10 साल के बच्चे की सड़क हादसे में मौत हो गई और विधानसभा में चर्चा हो रही थी कि अध्यक्ष कैसे चुना गया और वह कैसे एक पार्टी से दूसरी पार्टी में गया… यह क्या हो रहा है? तुम भी (सईद) पार्टी बदल लो… वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में खरीद-फरोख्त चल रही है। तुम्हारे (सईद) कुछ केस हैं… केस बदलने पर विचार करो, यहां तो 'वॉशिंग मशीन’ चल रही है।'आदेश में जस्टिस जमदार ने साफ कहा कि सिर्फ सरकार के फैसलों का विरोध करना किसी नागरिक को इलाके से बाहर करने का आधार नहीं हो सकता। ऐसा करने से व्यक्ति के अभिव्यक्ति और गरिमा के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने रैली और धरने आयोजित किए, जो महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत इलाके से बाहर करने का आधार नहीं है। यह कार्रवाई गलत और बदनीयत है। इसलिए याचिका मंजूर की जाती है और इलाके से बाहर करने का आदेश रद्द किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है, बल्कि गरिमा के साथ जीने का भी अधिकार है। सरकार की कार्रवाई इन अधिकारों का उल्लंघन करती है।
