Foreign Exchange: अमेरिका-ईरान जंग के बीच प्रवासी भारतीयों ने भेजे 16 अरब डॉलर, विदेशी मुद्रा में बड़ा उछाल
प्रवासी भारतीयों की तरफ से भेजे जाने वाली रकम में हो रहा इजाफा वित्त वर्ष 2025-26 में प्रवासी प्रेषण बढ़कर 155.1 अरब अमेरिकी डॉलर के
प्रवासी भारतीयों की तरफ से भेजे जाने वाली रकम में हो रहा इजाफा वित्त वर्ष 2025-26 में प्रवासी प्रेषण बढ़कर 155.1 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 135.4 अरब अमेरिकी डॉलर था। इस प्रकार इसमें वर्ष-दर-वर्ष 14.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रवासी द्वारा भेजी गई रकम का हिस्सा 2024-25 के 3.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 4.0 प्रतिशत हो गया। संकट के समय बनते हैं मददगार प्रवासी भारतीयों के अपने देश धन भेजने के कारणों में परोपकार की भावना भी काम करती रही है। असल में परोपकार प्रेरणा के कारण जब मूल देश कठिन परिस्थितियों का सामना करता है तो प्रवासी अपने परिवारों की सहायता के लिए अधिक धन भेजते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि लुकास और स्टार्क (1985) ने इस व्यवहार का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया था। कोविड-19 समेत पिछले संकटों के अनुभव भी दर्शाते हैं कि आर्थिक गिरावट के बावजूद मूल देश की कठिनाइयों के समय प्रवासी प्रेषण में वृद्धि हुई, जिससे परोपकार-आधारित इस सिद्धांत की पुष्टि होती है।
इसके अलावा प्रवासी प्रेषण का प्रवाह मेजबान देशों में रोजगार की स्थिति और मजदूरी स्तर पर आधारित होता है, न कि वित्तीय बाजारों के संकेतों या निवेशकों की धारणा पर। पोर्टफोलियो निवेश या ऋण वित्तपोषण के विपरीत प्रवासी प्रेषण प्रवासी श्रमिकों के रोजगार और परिवारों की आय जैसी अपेक्षाकृत स्थायी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं, जो भू-राजनीतिक घटनाओं या वित्तीय बाजारों के उतार-चढ़ाव से तुरंत प्रभावित नहीं होतीं। वित्त वर्ष 2025-26 में प्रवासी प्रेषण बढ़कर 155.1 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 135.4 अरब अमेरिकी डॉलर था। इस प्रकार इसमें वर्ष-दर-वर्ष 14.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रवासी द्वारा भेजी गई रकम का हिस्सा 2024-25 के 3.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 4.0 प्रतिशत हो गया।प्रवासी भारतीयों के अपने देश धन भेजने के कारणों में परोपकार की भावना भी काम करती रही है। असल में परोपकार प्रेरणा के कारण जब मूल देश कठिन परिस्थितियों का सामना करता है तो प्रवासी अपने परिवारों की सहायता के लिए अधिक धन भेजते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लुकास और स्टार्क (1985) ने इस व्यवहार का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया था। कोविड-19 समेत पिछले संकटों के अनुभव भी दर्शाते हैं कि आर्थिक गिरावट के बावजूद मूल देश की कठिनाइयों के समय प्रवासी प्रेषण में वृद्धि हुई, जिससे परोपकार-आधारित इस सिद्धांत की पुष्टि होती है।इसके अलावा प्रवासी प्रेषण का प्रवाह मेजबान देशों में रोजगार की स्थिति और मजदूरी स्तर पर आधारित होता है, न कि वित्तीय बाजारों के संकेतों या निवेशकों की धारणा पर। पोर्टफोलियो निवेश या ऋण वित्तपोषण के विपरीत प्रवासी प्रेषण प्रवासी श्रमिकों के रोजगार और परिवारों की आय जैसी अपेक्षाकृत स्थायी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं, जो भू-राजनीतिक घटनाओं या वित्तीय बाजारों के उतार-चढ़ाव से तुरंत प्रभावित नहीं होतीं। अमेरिका और ईरान जंग के बावजूद प्रवासी भारतीयों ने विदेशी मुद्रा भेजने में खूब दरियादिली दिखाई। जंग शुरू होने के एक महीने बाद यानी अप्रैल में इन्होंने 16 अरब अमेरिकी डॉलर भारत भेजे।
