भारत में क्यों ज्यादा नहीं बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?: पूर्व राजदूत का खुलासा, सरकार की कूटनीति पर कही ये बात
संजय सुधीर के अनुसार, संकट की शुरुआत में ही सरकार ने एक अंतर-मंत्रालयीय समूह का गठन किया, जिसमें सभी महत्वपूर्ण मंत्रालय शामिल थे। इस समूह
संजय सुधीर के अनुसार, संकट की शुरुआत में ही सरकार ने एक अंतर-मंत्रालयीय समूह का गठन किया, जिसमें सभी महत्वपूर्ण मंत्रालय शामिल थे। इस समूह का उद्देश्य न केवल कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना था, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना था कि आपूर्ति मजबूत और विश्वसनीय हो, साथ ही वितरण व्यवस्था भी सुचारू रहे। उन्होंने कहा, "इसी दौरान हमारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी), रिफाइनरियों और अन्य कंपनियों ने अपने प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं और साझेदारों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा, जो बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।"पूर्व राजदूत ने आगे कहा, "भारत ने बेहद कुशल कूटनीति का परिचय दिया। नई दिल्ली ने तेहरान और खाड़ी देशों की राजधानियों के साथ लगातार सक्रिय संपर्क बनाए रखा। समझौता ज्ञापन से पहले के दौर में भारत 12 एलपीजी जहाज, दो कच्चे तेल के जहाज और दो एलएनजी जहाज सुरक्षित रूप से ला सका।
एमओयू पर हस्ताक्षर के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। इसके बाद 11 और बड़े जहाज (वीएलसीसी) भारत पहुंचे, जिनमें 10 कच्चे तेल और एक एलपीजी लेकर आया।"होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के बावजूद भारत गंभीर ईंधन संकट और आपातकालीन स्थिति से कैसे बचा गया, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "स्पष्ट निर्भरता के बावजूद हम ऐसी स्थिति से निपटने के लिए काफी हद तक तैयार थे। एलपीजी के लिए लगभग 90 प्रतिशत, एलएनजी के लिए 60 प्रतिशत और कच्चे तेल के लिए करीब 40 प्रतिशत निर्भरता पश्चिम एशिया और होर्मुज जलडमरूमध्य पर है। ऐसे में अगर यह मार्ग पूरी तरह बंद रहता, तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ सकता था।"उन्होंने कहा, "सकारात्मक बात यह रही कि सरकार ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी। कई प्रशासनिक कदम उठाए गए और इसी वजह से हमें आपातकालीन उपाय लागू करने की जरूरत नहीं पड़ी।
पिछले दो दशकों में हमने कच्चे तेल के नए आपूर्तिकर्ता खोजे हैं, जिससे आपूर्ति के स्रोतों में विविधता आई। साथ ही एलपीजी आयात के लिए टर्मिनलों, पाइपलाइनों और सिटी गैस नेटवर्क के विस्तार ने भी ऐसी परिस्थितियों से निपटने में मदद की।"घरेलू ईंधन कीमतों में सिर्फ सात प्रतिशत वृद्धि होने, जबकि दुनिया के कई देशों में कीमतों में दो अंकों की बढ़ोतरी होने के सवाल पर संजय सुधीर ने कहा, "अगर दुनिया के अन्य देशों को देखें तो वहां ईंधन की कीमतों में औसतन 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। भारत ने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखा और आखिर में सिर्फ सात प्रतिशत की वृद्धि की। इसके लिए सरकार ने आपूर्ति और मांग, दोनों मोर्चों पर काम किया।"उन्होंने कहा, "घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देना बेहद महत्वपूर्ण था, ताकि कीमतों में बढ़ोतरी और संभावित कमी का असर आम लोगों पर कम पड़े।
सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) भी घटाया।"सुधीर ने बताया, "उस समय तेल विपणन कंपनियों को हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी हो रही थी। सरकार को पेट्रोल पर करीब 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 30 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा था। लेकिन देश की व्यापक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए यह अल्पकालिक बोझ उठाना जरूरी था।"उन्होंने कहा, "भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 156 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इसके बावजूद सरकार घरेलू ईंधन कीमतों को काफी हद तक नियंत्रित रखने में सफल रही।"
