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'सभी पक्षों से राय ले विशेषज्ञ समिति', अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Published 25 May 2026 · world

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत शृंखला की स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए बनाई जाने वाली विशेषज्ञ समिति को पर्यावरण विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से सलाह लेनी चाहिए, ताकि आम लोगों की राय भी सामने आ सके। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ)

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत शृंखला की स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए बनाई जाने वाली विशेषज्ञ समिति को पर्यावरण विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से सलाह लेनी चाहिए, ताकि आम लोगों की राय भी सामने आ सके। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि समिति बहुत बड़ी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ज्यादा सदस्यों के कारण कामकाज संभालना मुश्किल हो जाता है।

अदालत ने कहा कि समिति में पांच से सात सदस्य पर्याप्त होंगे। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और न्यायालय के सहयोगी वकील (एमिकस क्यूरी) ने समिति के लिए कुछ नाम सुझाए हैं, जिन्हें अंतिम रूप दिया जा सकता है। एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि समिति को पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ-साथ स्थानीय लोगों और अन्य हितधारकों की राय भी सुननी चाहिए, ताकि व्यापक जनमत सामने आ सके।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से अरावली की परिभाषा तय करने वाली समिति के लिए विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कह चुका है। अरावली पर्वतमाला को दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में माना जाता है। खबरें और भी दरअसल, पिछले साल 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बाद अपने 20 नवंबर वाले आदेश पर रोक लगा दी थी। उसी आदेश में अरावली क्षेत्र में सभी खनन गतिविधियों पर भी रोक लगाई गई थी।

अदालत ने कहा था कि नई परिभाषा में कई “महत्वपूर्ण अस्पष्टताएं” हैं। खासतौर पर यह सवाल उठाया गया कि क्या 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर दूरी का मानदंड पर्यावरण संरक्षण के दायरे को सीमित कर देगा।

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