Study: आसान कनेक्टिविटी के बिना अधूरी इलेक्ट्रिक वाहन नीति, अध्ययन ने खोली परिवहन व्यवस्था की परतें
अध्ययन के मुताबिक अगर सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी मजबूत नहीं हुई तो इलेक्ट्रिक वाहन भी
अध्ययन के मुताबिक अगर सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी मजबूत नहीं हुई तो इलेक्ट्रिक वाहन भी अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएंगे। यह निष्कर्ष जर्मन कॉर्पोरेशन फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जीआईजेड) और नीति आयोग के संदर्भों के साथ द क्लाइमेट एजेंडा द्वारा पटना और लखनऊ में किए गए अध्ययन में सामने आया है। यह अध्ययन इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू में प्रकाशित किया गया है।भारत में ऊर्जा से जुड़े कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है। परिवहन में इस्तेमाल होने वाली 95 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा अब भी पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है। पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र से उत्सर्जन लगातार बढ़ा है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों तथा इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर जोर दे रही हैं।
ये भी पढे़ं बस स्टॉप तक पहुंचना भी चुनौतीपूर्ण सफर अध्ययन में सामने आया कि लखनऊ में 63% लोगों को सार्वजनिक परिवहन तक पहुंचने के लिए लगभग एक किमी पैदल चलना पड़ता है। कई लोगों के लिए यह दूरी दो से तीन किलोमीटर तक पहुंच जाती है। मजदूरों, घरेलू कामगारों यह अतिरिक्त दूरी रोजाना की मजबूरी बन चुकी है। यातायात की स्थिति भी चिंताजनक है। लखनऊ के कई प्रमुख मार्गों पर वाहनों की औसत गति घटकर केवल 11 से 14 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। केवल आठ प्रतिशत लोगों ने माना कि शहर में पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अध्ययन के मुताबिक अगर सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी मजबूत नहीं हुई तो इलेक्ट्रिक वाहन भी अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएंगे। यह निष्कर्ष जर्मन कॉर्पोरेशन फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जीआईजेड) और नीति आयोग के संदर्भों के साथ द क्लाइमेट एजेंडा द्वारा पटना और लखनऊ में किए गए अध्ययन में सामने आया है।
यह अध्ययन इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू में प्रकाशित किया गया है।भारत में ऊर्जा से जुड़े कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है। परिवहन में इस्तेमाल होने वाली 95 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा अब भी पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है। पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र से उत्सर्जन लगातार बढ़ा है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों तथा इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर जोर दे रही हैं।ये भी पढे़ं: Bengal Politics: शहीद दिवस रैली के आयोजन स्थल को लेकर ममता और बागी गुट आमने-सामने, पुलिस की अनुमति पर संशय अध्ययन में सामने आया कि लखनऊ में 63% लोगों को सार्वजनिक परिवहन तक पहुंचने के लिए लगभग एक किमी पैदल चलना पड़ता है। कई लोगों के लिए यह दूरी दो से तीन किलोमीटर तक पहुंच जाती है।
