लखनऊ अग्निकांड- एक-दूसरे का हाथ पकड़े मिलीं लाशें:अंदर विजिबिलिटी जीरो, टॉर्च काम नहीं कर रही थी; रेस्क्यू करने वालों की जुबानी
'पूरी बिल्डिंग में धुआं भरा था। पिछली दीवार और खिड़कियां तोड़ी गईं। ब्रीदिंग ऑपरेटस (ऑक्सीजन मास्क) लगाकर रस्सी के सहारे सेकेंड फ्लोर पर पहुंचा गया।
'पूरी बिल्डिंग में धुआं भरा था। पिछली दीवार और खिड़कियां तोड़ी गईं। ब्रीदिंग ऑपरेटस (ऑक्सीजन मास्क) लगाकर रस्सी के सहारे सेकेंड फ्लोर पर पहुंचा गया। धुएं की वजह से विजिबिलिटी जीरो थी। टॉर्च की रोशनी भी काम नहीं कर रही थी। अंदाजे से आगे बढ़ा जा रहा था। भीतर जाकर शीशे तोड़े गए। इससे बिल्डिंग से धुआं बाहर निकलना शुरू हुआ। इसके बाद हेड हॉपर स्टूडियो के अंदर पहुंचे। कई बार ऐसा हुआ कि किसी व्यक्ति के शरीर से पैर टकराने के बाद पता चला कि वहां कोई पड़ा है। अंदर केबिन और वॉशरूम में एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए लाशें पड़ी थीं। किसी का सिर एक तरफ और शरीर दूसरी तरफ झुका था। एक युवक ने मुंह पर हाथ रखा था। शरीर दीवार के सहारे टिका था। इससे लग रहा था कि धुएं से बचने के लिए उसने नाक-मुंह ढंकने की कोशिश की, लेकिन बच नहीं सका।' यह भयावह मंजर लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड में रेस्क्यू ऑपरेशन का हिस्सा रहे अफसरों और फायरकर्मियों ने बयां किया। भास्कर रिपोर्टर ने रेस्क्यू ऑपरेशन में लगे अफसरों, फायरकर्मियों और पुलिसकर्मियों से बातचीत की। पूरे रेस्क्यू के दौरान क्या चुनौतियां आईं? अंदर की क्या कहानियां हैं? इस बारे में उन्होंने जो कुछ बताया, उन्हीं की जुबानी जानिए… पहले रेस्क्यू करने वाले फायर फाइटर्स की 3 तस्वीरें… अब पढ़िए फायर फाइटर्स क्या बता रहे हैं… केस-1- सीढ़ियों के पास एसी की आउटडोर यूनिट लगी थीं, सामने से नहीं जा पाई टीम घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले मड़ियांव थाने में तैनात सिपाही ने बताया- सीढ़ियों के बगल में बने संकरे हिस्से में एसी की 8-10 आउटडोर यूनिट लगी थीं।
वहीं पर बाइक और स्कूटी भी खड़ी थी, जो पूरी तरह जल गईं। इससे आग और धुआं तेजी से फैला। निकासी का रास्ता और संकरा हो गया। बिल्डिंग में अंदर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा था। सामने से आग बुझाई जा रही थी। बिल्डिंग के अन्य हिस्सों में न तो कोई खिड़की थी और न ही कोई ऐसी जगह, जहां से अंदर पहुंचा जा सके। ऐसे में कुछ फायरकर्मी पड़ोस की बिल्डिंग पर सीढ़ी लगाकर किसी तरह से छत पर पहुंचे। सोचा कि ऊपर से किसी तरह अंदर जाया जाए। लेकिन, छत की सीढ़ियों पर लगे गेट में मजबूत ताला लगा था। ऊपर से उसे तोड़ा नहीं जा सका। इसके बाद दीवार तोड़ने का फैसला लिया गया। केस 2- 9 इंच मोटी दीवार तोड़ने में समय लगा जिस रास्ते से डेड बॉडी निकाली गईं, उस दीवार को तोड़ने वाले फायरमैन से हमने बात की। उसने बताया- बिल्डिंग की पिछली दीवार तोड़कर अंदर जाना ज्यादा आसान लगा। इसी वजह से उसे तोड़ा गया। लेकिन, दीवार 9 इंच मोटी थी और उस पर प्लास्टर भी किया गया था। दीवार बेहद मजबूत थी। दीवार तोड़ने के लिए ड्रिल मशीन मंगाई गई। लेकिन बिजली नहीं आने से उसका इस्तेमाल नहीं हो सका। ऐसे में मड़ियांव थाने में तैनात सिपाही मयंक ने भारी हथौड़े से दीवार तोड़ने का फैसला लिया। मयंक बताते हैं- उस समय यही लग रहा था कि अब दीवार तोड़कर ही लोगों तक पहुंचा जा सकता है।
मशीन का इंतजार करने का समय नहीं था। इसलिए मैंने हथौड़े से लगातार वार शुरू किए। आखिरकार दीवार टूट गई। दीवार टूटते ही फायरकर्मियों को अंदर जाने का रास्ता मिल गया। केस 3- पहली बार अंदर कदम रखा तो विजिबिलिटी जीरो थी सबसे पहले अंदर घुसने वाले फायरमैन ने बताया- हम जब पहली बार अंदर गए, तो सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। विजिबिलिटी जीरो थी। टॉर्च की रोशनी भी धुएं की वजह से बेअसर हो रही थी। हम अंदाजे से पैर रखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कई बार ऐसा हुआ कि हमें किसी व्यक्ति के शरीर से पैर टकराने के बाद पता चला कि वहां कोई पड़ा है। घने धुएं और जटिल संरचना के कारण फायरकर्मियों ने एक-दूसरे को रस्सियों से जोड़ा हुआ था। एक अधिकारी ने बताया कि हम लगातार संपर्क में थे। डर था कि कहीं कोई जवान रास्ता भटक न जाए। इसलिए रस्सियों के सहारे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। केस 4- पूरे हॉल को केबिन में बांटा, लोग अलग-अलग पॉकेट में मिले डेडबॉडी निकालने वाले एक फायरमैन ने बताया- दूसरी मंजिल को ब्लॉक और केबिन सिस्टम में बांटा गया था। कांच के पार्टीशन की वजह से धुआं अलग-अलग हिस्सों में भर गया था। जब हम लोग अंदर पहुंचे, तो हर केबिन में शव मिले। किसी का शव दरवाजे के पास पड़ा था, तो किसी का केबिन में था।