Explainer: हाईकोर्ट का एक फैसला कैसे बना आपातकाल की बड़ी वजह? इसी ने इंदिरा के करियर पर लगाया था सबसे बड़ा दाग
12 जून 1975 को क्या हुआ? 12 जून का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला समझने के लिए 1971 में जाना होगा। जब लोकसभा चुनाव में रायबरेली
12 जून 1975 को क्या हुआ? 12 जून का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला समझने के लिए 1971 में जाना होगा। जब लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था। चुनाव में हार के बाद राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और अधिकारियों का दुरुपयोग किया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया गया और सरकारी कर्मचारी उनके चुनाव अभियान में शामिल रहे। करीब चार साल तक चली सुनवाई के बाद 19 मार्च 1975 को एक अभूतपूर्व घटना हुई। इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने लगभग पांच घंटे तक न्यायालय में सवालों के जवाब दिए। इसके बाद 12 जून को इहालाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया। इसके 13 दिन बाद 25 जून की रात को देश में आपातकाल लगा। आइये जानते हैं इन 13 दिनों की पूरी कहानी... 12 जून 1975: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 15 में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया। 238 पृष्ठों के निर्णय में अदालत ने 14 आरोपों में से 12 को खारिज कर दिया, लेकिन दो आरोपों को सही माना। पहला आरोप इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे यशपाल कपूर ने औपचारिक रूप से सरकारी पद छोड़ने से पहले ही उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। दूसरा आरोप उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं।
अदालत ने माना कि यह सरकारी मशीनरी का चुनावी उपयोग था, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन था। अदालत ने उनके 1971 के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए 20 दिन का समय दिया गया। देश में पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव अदालत ने रद्द किया था। इससे सरकार की वैधता पर सवाल उठने लगे। 13 जून 1975: इस्तीफे की मांग शुरू फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क था कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है तो नैतिक रूप से प्रधानमंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं है। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा इंडिया आफ्टर नेहरू में लिखते हैं कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। हरियाणा के तत्कलीन मुख्यमंत्री बंसीलाल बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिल्ली लाने लगे, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी और जनता का बड़ा हिस्सा अब भी प्रधानमंत्री के साथ है। उनके समर्थन में नारे लगाए गए, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा के पुतले भी जलाए गए। 14 से 19 जून 1975: समर्थन और विरोध का दौर गुहा ने बताया कि इस दौरान इंदिरा गांधी कई बार बाहर आकर समर्थकों को संबोधित करती रहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की कुछ राजनीतिक ताकतें विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं और उनके विरोधियों के पास अपार संसाधन उपलब्ध हैं।
