Samwad 2026: मणिपुर में क्यों होता है संघर्ष? रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप ने बताई इसके पीछे की वजह
अमर उजाला देहरादून में 'अमर उजाला संवाद उत्तराखंड 2026' का आयोजन कर रहा है। कार्यक्रम में सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता शामिल हुए। इस
अमर उजाला देहरादून में 'अमर उजाला संवाद उत्तराखंड 2026' का आयोजन कर रहा है। कार्यक्रम में सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने देश की सुरक्षा और आंतरिक चुनौतियों पर खुलकर बात की। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने इस दौरान मणिपुर में बार-बार भड़कने वाली हिंसा के पीछे की असली वजह सामने रखी। उन्होंने कहा, उत्तर पूर्व का सबसे जटिल राज्य मणिपुर है। मणिपुर की 53 फीसदी आबादी मैतेई है। जो वहां के 10 फीसदी तराई इलाके में रहती है। बाकी 90 फीसदी जमीन पर कुकी और नागा आबादी रहती है। जमीन के ऊपर दबाव वहां की समस्या का एक बड़ा कारण है। संवाद के मंच पर सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने कहा कि, पूर्वोत्तर में सबसे कठिन राज्य मणिपुर है। यहां तीन समुदाय रहती हैं। पहला समुदाय मैतेई समुदाय है, जो 53 फीसदी है। जो इंफाल घाटी में रहेते हैं। नगा समुदाय की जनसंख्या 20 फीसदी है, वो पहाड़ी के उपर रहते हैं।
तीसरा समुदाय कुकी समुदाय है। ये समुदाय घाटी और पहाड़ के बीच वाले इलाके में रहते हैं। ये 2011 के जनसंख्या गणना के हिसाब से 16 फीसदी है। मणिपुर में कुकी-नगा अनुसूचित जनजाति समुदाय है, जबकि मैतेयी सामान्य जाति है। मैतेई मणिपुर के 10 फीसदी इलाके में रहतेहैं। बाकी की 46 फीसदी नगा और कुकी का कब्जा मणिपुर की 90 फीसदी जमीन पर है।इसके अलावा नगा और कुकी समुदाय के लोग इंफाल घाटी में जमीन खरीद सकते हैं और रह सकते हैं, जबकि मैतेई पहाड़ों में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। यह समस्या ये भी है। दूसरी समस्या नगा और कुकी समुदाय को मिला आरक्षण भी है। जबकि मैतेई समुदाय को आरक्षण नहीं मिला हुआ है और बेरोजगारी हमारे देश में एक बड़ा मुद्दा है, जमीन की कमी और रोजगार की उपलब्ध बड़ा मुद्दा है।तीसरा मुद्दा राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व है। राज्य की विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या 60 है। उसमें 40 विधायक इंफाल घाटी से हैं, जहां मैतेई जनसंख्या बड़ी तादात में है।
इसके बाद 10 विधायक नगा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और 10 विधायक कुकी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकार में इस वजह से दखल मैतेई समुदाय का है। इसके अलावा पहाड़ के लोगों और मैदान के लोगों के बीच विकास कार्यों में भी अंतर होता है।वहीं कश्मीर के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा- मैं खुद को भाग्यवान समझता हूं कि मुझे कश्मीर में काफी साल सेवा करने का मौका मिला। मेरे 40 साल के सेवा के दौरान मैंने 11 साल अलग-अलग रैंक में बिताए, मेजर से लेकर मेजर जनरल तक सेवारत था। उरी की सर्जिकल स्ट्राइक मुझे अभी याद है, तब मैं ब्रिगेडियर के रैंक पर था और श्रीनगर के हेडक्वार्टर में सेवारत था, जब 16 अक्तूबर जब आतंकी हमला हुआ, तो वहां पर हमारे जो जवान बलिदान हुए थे, तो उस समय जो कोर कमांडर से जनरल दुआ, वो और मैं तुरंत हेलीकॉप्टर से उरी गए थे और बाद में कई शीर्ष अधिकारी भी मौके पर पहुंचे।
तो हम लोगों ने घटना का जायजा लिया और उस समय सबके मन में यही था कि इसे हम भुलाएंगे नहीं और बदला जरूर लेंगे और इसके ऐसे किया जाएगा, जिससे उग्रवादियों के संगठन को नुकसान पहुंचाएंगे। इसके पहले ही सेना की तरफ से अलग-अलग हालातों के लिए कुछ तैयारियां की जाती है और इस घटना के बाद इसे और तेजी से किया गया। फिर तकरीबन 12 या 13 दिन के बाद ही सर्जिकल स्ट्राइक किया गया। मैं यही कहना चाहूंगा, मेरा रोल बीजीएस ऑपरेशन का था, जो सभी प्रकार के ऑपरेशन कश्मीर में जो होते हैं, उसे कॉर्डिनेट और कंट्रोल करते हैं। ऑपरेशन की मॉनिटरिंग मैंने की थी रात भर, यूएवी, ड्रोन से फुटेज के साथ। इस ऑपरेशन के बारे में कई अधिकारियों को जानकारी नहीं थी। इस ऑपरेशन के बारे में उनको पता था जो इससे जुड़े थे सिर्फ उन्हें ही बताया गया था।
