Lucknow, India

क्या है 'हीट इंश्योरेंस', जोखिम का सामना कर रहे 76 प्रतिशत भारतीयों की कैसे कर सकता मदद?

Published 24 May 2026 · india

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इस समय देश गर्मी की चपेट में है। गर्मी अपने साथ तमाम चुनौतियां भी लेकर आती है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के एक नए विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के 57 प्रतिशत जिले गर्मी के ऊंचे से लेकर बहुत ऊंचे जोखिम

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इस समय देश गर्मी की चपेट में है। गर्मी अपने साथ तमाम चुनौतियां भी लेकर आती है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के एक नए विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के 57 प्रतिशत जिले गर्मी के ऊंचे से लेकर बहुत ऊंचे जोखिम पर हैं। मेट्रो शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक गर्मी अब एक देशव्यापी संकट बन गई है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने यह भी बताया है कि कम से कम 23 राज्यों में नियमित रूप से खतरनाक रूप से उच्च तापमान देखा गया है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि यह चुनौती कितनी व्यापक हो चुकी है। सूरज ढलने के बाद भी नहीं मिल रही राहत रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गर्म रातें भारत की गर्मियों की एक खास पहचान बनती जा रही हैं। पिछले एक दशक में कई जिलों में बहुत गर्म दिनों के मुकाबले बहुत गर्म रातें ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। इसका मतलब है कि लोगों को सूरज डूबने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है। शरीर ठंडा नहीं हो पाता, नींद में खलल पड़ता है और सेहत से जुड़े जोखिम बढ़ जाते हैं। गर्मी से बढ़ा जिंदगी का जोखिम इस गर्मी में इंसान को अपनी जान देकर कीमत भी चुकानी पड़ती है।

रातें गर्म होने और नमी बढ़ने से पसीने के जरिए शरीर की गर्मी बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। इससे हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है और पुरानी बीमारियां घर कर जाती हैं। खासकर बुज़ुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दिल या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारियों वाले लोगों के लिए। खबरें और भी शहरीकरण से हालात और भी बिगड़े तेजी हो रहे शहरीकरण से हालात और भी बदतर होते जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में निर्माण वाले इलाके बढ़ गए हैं और पेड़ों की संख्या कम हो गई है। कंक्रीट और डामर दिन के समय गर्मी को सोख लेते हैं और रात में उसे बाहर निकालते हैं। इस 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' के कारण लोग जागते रहते हैं, शरीर के सूखने से उन पर ज्यादा जोर पड़ता है और उनकी कमजोरी बढ़ती जाती है। अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रही है मार निर्माण, लॉजिस्टिक्स, कृषि और डिलीवरी सेवाओं में काम करने वाले मजदूरों की उत्पादकता तब कम हो जाती है, जब गर्मी सुरक्षित सीमा से ज्यादा बढ़ जाती है। इससे व्यवसायों को देरी का सामना करना पड़ता है, सप्लाई चेन में रुकावट आती है और जैसे-जैसे ज्यादा लोग ठंडक पाने के लिए कूलिंग पर निर्भर होते हैं, ऊर्जा की मांग अचानक बढ़ जाती है।

इसलिए, गर्मी की वजह से होने वाले आर्थिक नुकसान के लिए बीमा का विचार सामाजिक संगठनों, सरकारी अधिकारियों और वित्तीय क्षेत्र की निजी कंपनियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। उत्पादकता पर असर विभावंगल अनुकूलकरा के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य के अनुसार, गर्मी का तनाव पहले से ही उत्पादकता पर बुरा असर डाल रहा है। उनका कहना है कि लंबे समय तक पड़ने वाली गर्मी के कारण भारत को उत्पादन में कमी के रूप में लगभग 150 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां ज्यादा मजदूर काम करते हैं। वित्तीय झटकों से उबारने का काम करता हीट इंश्योरेंस इसलिए, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले वित्तीय झटकों से निपटने के लिए व्यवसायों और MSMEs के लिए 'हीट इंश्योरेंस' एक अहम जोखिम-प्रबंधन साधन के तौर पर उभर रहा है। मौर्य का कहना है कि ये नए उत्पाद तुरंत भुगतान की सुविधा देते हैं, जिससे मौसम की वजह से कामकाज में रुकावट आने पर भी कंपनियां अपना काम जारी रख पाती हैं। उन्हें उम्मीद है कि समय के साथ "हीट इंश्योरेंस" भारत की अर्थव्यवस्था में जोखिम प्रबंधन के लिए एक मुख्यधारा का वित्तीय साधन बन जाएगा। पहले, पारंपरिक वित्तीय सुरक्षा जलवायु से जुड़े नुकसानों की भरपाई करने में संघर्ष करती थी।

खासकर अनौपचारिक और कम आय वाले श्रमिकों के लिए। अब पैरामीट्रिक हीट इंश्योरेंस (गर्मी से सुरक्षा बीमा) अपने-आप भुगतान कर देता है, जब मौसम से जुड़े कारक पहले से तय सीमा तक पहुंच जाते हैं। इंश्योरेंस का ये मॉडल क्या है? जिन लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं है, उनके लिए बता दें कि पैरामीट्रिक इंश्योरेंस एक गैर-पारंपरिक इंश्योरेंस मॉडल है। इस मॉडल के तहत जब कोई खास घटना (ट्रिगर इवेंट) होती है जैसे भूकंप, तूफान या बारिश तो पहले से तय की गई एकमुश्त रकम का भुगतान किया जाता है। इसका एक असल दुनिया का उदाहरण दें तो नागालैंड में सरकार ने 2024 से पैरामीट्रिक मॉडल के तहत भारी बारिश के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान से अपनी पूरी आबादी का इंश्योरेंस कराया हुआ है। इसी तरह कई श्रमिक संघ ऐसे संकटों के लिए कुछ मुआवजा प्रदान करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई निजी कंपनियों ने भी अपने पैरामीट्रिक बीमा उत्पाद लॉन्च किए हैं।

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