राजगोपाल से कुरियन तक: दिल्ली में एंट्री के बाद चुपचाप एग्जिट, क्या है भाजपा का केरल फॉर्मूला? इनसाइड स्टोरी
वैसे तो जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री की विदाई नहीं है। यह केरल में भाजपा की एक खास राजनीतिक क्रोनोलॉजी को समझने का
वैसे तो जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री की विदाई नहीं है। यह केरल में भाजपा की एक खास राजनीतिक क्रोनोलॉजी को समझने का मौका है। इसे आप भाजपा का 'केरल फॉर्मूला' कह सकते हैं। इस फॉर्मूले के तहत नेताओं को दिल्ली का रास्ता तो मिलता है, लेकिन उनका सफर बहुत छोटा होता है। आइए, भाजपा के इस फैसले को विस्तार से समझते हैं।केरल में भाजपा के लिए चुनावी राह हमेशा से बेहद मुश्किल रही है। वहां पारंपरिक रूप से एलडीएफ और यूडीएफ का दबदबा रहा है। ऐसे में राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भाजपा एक तय रणनीति अपनाती रही है। पहले केरल के किसी कद्दावर नेता को चुना जाता है। फिर उसे दूसरे राज्य (जैसे मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र) से राज्यसभा भेजा जाता है। इसके बाद उन्हें केंद्र में मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।रणनीति तो अच्छी है, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस फॉर्मूले के तहत किसी भी नेता को 'दूसरा चांस' यानी सेकंड टर्म नहीं मिला।जॉर्ज कुरियन इस लिस्ट में शामिल होने वाले चौथे नेता हैं। उनसे पहले भी तीन बड़े चेहरे इसी चक्रव्यूह से गुजर चुके हैं:-केरल भाजपा के सबसे वरिष्ठ चेहरों में से एक। राज्यसभा के रास्ते केंद्र में मंत्री बने।
लेकिन कार्यकाल आगे नहीं बढ़ा।पूर्व नौकरशाह। उन्हें भी राज्यसभा से लाकर मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री (पर्यटन राज्य मंत्री) बनाया गया था। कार्यकाल खत्म, तो पारी भी खत्म हो गई।मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विदेश राज्य मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी संभाली। महाराष्ट्र से राज्यसभा गए थे, लेकिन दोबारा मौका नहीं मिला।जून 2024 में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मंत्री बने। अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया। जून 2026 में कार्यकाल खत्म होते ही कहानी खत्म।राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं।भाजपा केरल में किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रहना चाहती। वह हर बार एक नए समुदाय या क्षेत्र के नेता को आगे बढ़ाकर सामाजिक समीकरण सोशल इंजीनियरिंग साधने की कोशिश करती है। जैसे कुरियन को लाकर ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश की गई थी।जो नेता जमीन पर चुनाव नहीं जीत पाते, उन्हें संगठन में वापस भेज दिया जाता है। कुरियन ने भी कांजीरपल्ली से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। पार्टी अब उन्हें वापस संगठन की जमीनी ढाल बनाने के मूड में है।पहले भाजपा के पास केरल से लोकसभा का कोई विकल्प नहीं था। इसलिए राज्यसभा एकमात्र रास्ता था। लेकिन 2024 के आम चुनाव में अभिनेता सुरेश गोपी ने त्रिशूर सीट जीतकर इतिहास रच दिया।
सुरेश गोपी सीधे जनता द्वारा चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं। ऐसे में अब भाजपा के पास केरल का एक मजबूत और परमानेंट चेहरा है। यही वजह है कि अब पार्टी को राज्यसभा के सहारे 'बैकडोर एंट्री' वाले मंत्रियों पर निर्भर रहने की मजबूरी कम हो गई है।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने इस पुराने फॉर्मूले को पूरी तरह बंद कर देगी? केरल से भाजपा के नए राज्यसभा उम्मीदवार सी. सदानंदन मास्टर हैं। अब देखना होगा कि क्या उन्हें भी कुरियन की तरह कैबिनेट में जगह मिलती है, या फिर केरल का दारोमदार सिर्फ अकेले सुरेश गोपी के कंधों पर ही रहेगा।खैर, ये तो हो गई भाजपा के फॉर्मूले की बात। लेकिन जॉर्ज कुरियन ने अचानकर इस्तीफा क्यों दिया? इसके पीछे कुछ वजहें बताई जा रही हैं। दरअसल, जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था। नियम के मुताबिक, मंत्री पद पर बने रहने के लिए संसद सदस्य होना जरूरी है। भाजपा ने उन्हें दोबारा राज्यसभा का टिकट नहीं दिया, जिसके कारण सांविधानिक मजबूरी की वजह से उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 23 जून 2026 को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस इस्तीफे के पीछे कुछ राजनीतिक वजहें भी हैं।
