चिंताजनक: हर वर्ष 5,000 करोड़ टन रेत का दोहन, खतरे में नदियां और समुद्री तट; प्रकृति नहीं पूरा कर पा रही भंडार
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर साल लगभग 5,000 करोड़ टन रेत निकाली और उपयोग की जा रही
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर साल लगभग 5,000 करोड़ टन रेत निकाली और उपयोग की जा रही है। चिंता की बात यह है कि जिस रेत को बनने में लाखों वर्ष लगते हैं, उसे कुछ ही दशकों में खत्म किया जा रहा है। रिपोर्ट बताती है कि शहरीकरण, बढ़ती आबादी और आधारभूत ढांचे के विस्तार के कारण रेत की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि केवल निर्माण क्षेत्र में ही वर्ष 2060 तक रेत की जरूरत करीब 45 प्रतिशत बढ़ सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल खपत की मात्रा नहीं है, बल्कि यह भी है कि प्रकृति जिस गति से रेत का निर्माण करती है, मानव समाज उससे कहीं अधिक तेजी से उसका दोहन कर रहा है।
चट्टानों के क्षरण व प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बनने वाली रेत का पुनर्निर्माण हजारों नहीं, बल्कि लाखों वर्षों में होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक उपलब्धता के बीच बढ़ती खाई को एक उभरते वैश्विक संकट के रूप में देख रहे हैं।रिपोर्ट का एक और चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि दुनिया की लगभग आधी ड्रेजिंग कंपनियां समुद्री संरक्षित क्षेत्रों के भीतर भी रेत निकाल रही हैं। इन क्षेत्रों से प्राप्त रेत वैश्विक समुद्री रेत खनन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संरक्षण के लिए घोषित क्षेत्रों में भी खनन जारी रहा, तो समुद्री जैव विविधता को बचाने के प्रयास कमजोर पड़ जाएंगे।अक्सर रेत को केवल सीमेंट और कंक्रीट का कच्चा माल समझा जाता है, लेकिन इसकी भूमिका इससे कहीं व्यापक है।
नदियों और समुद्री तटों पर मौजूद रेत अनेक जीव-जंतुओं के आवास का आधार है। मछलियां, कछुए, केकड़े, पक्षी और अन्य कई प्रजातियां सीधे तौर पर इन पारिस्थितिक तंत्रों पर निर्भर हैं। इसके अलावा रेत प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती है, जो पानी को साफ रखने में मदद करती है। यह नदियों के प्रवाह को संतुलित रखती है।यूएनईपी की रिपोर्ट रेत को समझने का एक नया दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के अनुसार जब रेत को निकालकर सीमेंट, कंक्रीट या डामर का हिस्सा बना दिया जाता है, तब वह हमेशा के लिए प्राकृतिक चक्र से बाहर हो जाती है।
इसे मृत रेत कहा गया है। इसके विपरीत नदियों, डेल्टा और समुद्री तटों में मौजूद रेत जिंदा रेत है, जो प्रकृति को सेवाएं देती है।
