Census Duty: निजी स्कूल शिक्षकों की जनगणना ड्यूटी पर बॉम्बे HC ने लगाई अंतरिम रोक, कहा- पढ़ाई पर पड़ेगा असर
जनगणना ड्यूटी पर नहीं पहुंचने वाले कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई पर भी रोक। कोर्ट ने कहा- कानून निजी स्कूलों पर स्टाफ उपलब्ध कराने की बाध्यता नहीं डालता। शिक्षकों की तैनाती से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका जताई। मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई 2026 को होगी। जस्टिस गौतम
जनगणना ड्यूटी पर नहीं पहुंचने वाले कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई पर भी रोक। कोर्ट ने कहा- कानून निजी स्कूलों पर स्टाफ उपलब्ध कराने की बाध्यता नहीं डालता। शिक्षकों की तैनाती से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका जताई। मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई 2026 को होगी। जस्टिस गौतम अंखड और जस्टिस संदेश पाटिल की अवकाश पीठ ने यह आदेश देते हुए अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि जनगणना ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं करने वाले स्कूल कर्मचारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।दरअसल, ‘गैर-सहायता प्राप्त स्कूल फोरम’ और अन्य शैक्षिक संगठनों ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुंबई, पुणे, नागपुर और नवी मुंबई नगर निगमों की ओर से जारी आदेशों को चुनौती दी थी।
इन आदेशों के तहत निजी स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना कार्य के लिए गणक और पर्यवेक्षक नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड ने दलील दी कि शैक्षणिक सत्र के दौरान शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने से स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित होगी और इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 4ए के तहत केवल स्थानीय प्राधिकरणों को ही कर्मचारियों की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल इस श्रेणी में नहीं आते।वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जनगणना देश के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक है और शिक्षा का अधिकार कानून में कुछ परिस्थितियों में शिक्षकों की तैनाती की अनुमति दी गई है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि फिलहाल गर्मी की छुट्टियों के कारण स्कूल बंद हैं, इसलिए पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी।हालांकि, हाई कोर्ट ने सरकार की दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि आरटीई कानून की धारा 27 केवल गैर-शैक्षणिक कार्यों पर लगे सामान्य प्रतिबंध में अपवाद का प्रावधान है, इसे निजी स्कूल कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से जनगणना ड्यूटी में लगाने का स्वतंत्र कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में शिक्षकों को जनगणना कार्य के लिए बुलाया गया है, जिससे नियमित पढ़ाई बाधित होगी और छात्रों के निर्बाध शिक्षा के अधिकार पर असर पड़ेगा।
अदालत ने यह भी कहा कि जनगणना कार्य मौजूदा सरकारी मशीनरी, स्थानीय निकायों और सहायता प्राप्त संस्थानों के जरिए भी प्रभावी ढंग से कराया जा सकता है। कोर्ट ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई 2026 को होगी।
