Lucknow, India

बीजिंग को साधने के लिए अमेरिका की नई कूटनीति, सबसे पुरानी सैन्य कमान का नाम बदलकर करीबी दिखाने की कोशिश

Published 18 June 2026 · world

बीजिंग हमेशा से इंडो-पैसिफिक शब्दावली का विरोध करता रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि यह शब्द उसे घेरने के लिए भारत व अमेरिका की

बीजिंग हमेशा से इंडो-पैसिफिक शब्दावली का विरोध करता रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि यह शब्द उसे घेरने के लिए भारत व अमेरिका की जुगलबंदी दर्शाता है। अमेरिका का यह कदम दिखाता है कि वह चीन को पूरी तरह से दुश्मन बनाने के बजाय उसके साथ आर्थिक और रणनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश का मानना है कि यह अमेरिका का चीन की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने का संकेत हो सकता है।भारत ने हमेशा बहु-ध्रुवीय विश्व का समर्थन किया है और अमेरिका के नेतृत्व वाले किसी भी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से इनकार किया है।

भारत यूक्रेन संकट के बावजूद रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने और ईरान के साथ रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखने पर कायम रहा। नाम में बदलाव भारत को यह जताने का एक तरीका हो सकता है कि यदि आप हमारे पूरी तरह साथ नहीं हैं, तो हम भी अपनी प्राथमिकताएं बदल सकते हैं।चीन की बढ़ती ताकत देखते हुए अमेरिका को शायद यह अहसास हुआ है कि टकराव के बजाय साझा समझ दिखाना ज्यादा फायदेमंद है।

इस पूरी प्रक्रिया में भारत थोड़ा दरकिनार होता दिख रहा है। नक्शे और नाम में बदलाव कभी गलती से नहीं होते, यह एक सोचा-समझा संदेश है कि अमेरिका के लिए भारत की जरूरत अब थोड़ी कम और चीन की अहमियत बढ़ गई है।भूराजनीतिक विश्लेषक कमर आगा कहते हैं कि अमेरिका भारत पर लगातार दबाव डाल रहा था। अमेरिका चाहता था कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति वगैरह छोड़े और अमेरिकी छत्रछाया में आ जाए लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।

ये भी नाम में बदलाव की एक वजह हो सकती है।

Read full story on TheBriefWire

Loading…