TMC: संगठन पर ममता बनर्जी की पकड़ ने गड़बड़ाए बागियों के समीकरण, क्यों 'दीदी' का दावा हुआ मजबूत?
इसके अलावा भावी रणनीति को लेकर बागी विधायकों और बागी सांसदों की अलग-अलग राह ने भी पार्टी को बचाने की जंग लड़ रहीं ममता के
इसके अलावा भावी रणनीति को लेकर बागी विधायकों और बागी सांसदों की अलग-अलग राह ने भी पार्टी को बचाने की जंग लड़ रहीं ममता के लिए राहत की उम्मीदें बचाए रखी हैं। पार्टी संगठन में ममता दबदबे के कारण ही बागी सांसदों ने न सिर्फ मूल पार्टी के दावे से फिलहाल खुद को दूर रखा, बल्कि अयोग्यता की तलवार से बचने के लिए एक बेहद अपरिचित पार्टी में विलय का रास्ता अपनाया।दरअसल पार्टी पर दावे के संदर्भ में चुनाव आयोग और अदालतें अलग-अलग पक्ष में शामिल सांसदों-विधायकों की संख्या ही नहीं देखते, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का भी संज्ञान लेती है।
मसलन पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयों और जिला अध्यक्षों में कितने किस गुट के साथ हैं इसका भी परीक्षण करते हैं।राज्य विधानसभा में तृणमूल के 80 में से 64 विधायक बागी धड़े के साथ हैं। इसी आधार पर नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के बाद विरोधी धड़े ने मूल पार्टी पर अपना दावा जताया है। हालांकि बागी सांसदों के बागी विधायकों के साथ जाने के बदले एनसीपीआई में विलय से मामला उलझ गया है। अब बागी सांसदों के समर्थन के अभाव में बागी विधायकों का धड़ा मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं जता सकता।
वैसे भी पार्टी संगठन में अब भी ममता का दबदबा कायम है।मूल पार्टी पर अधिकार के लिए बागी विधायकों को भी बागी सांसदों के साथ एनसीपीआई मेंं विलय करना होगा। इसके अलावा बागी सांसदों-विधायकों को मूल पार्टी के संगठन में भी स्थिति मजबूत करनी होगी। बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने इशारा किया है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दोनों धड़ा मिल कर मूल पार्टी पर दावा करने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।बागी विधायक धड़ा भी अगर एनसीपीआई में विलय करता है तो अजीब सी स्थिति पैदा होगी।
तब राज्य में यह भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी और केंद्र में भाजपा के साथ होगी। मूल पार्टी का अधिकार मिलने पर भी यही स्थिति रहेगी। वैसे भी भाजपा की राज्य इकाई विरोधी धड़े के परोक्ष या सीधे गठजोर से बेहद नाराज है, ऐसे में नेतृत्व की चिंता केंद्रीय मंत्रिमंडल में बागी धड़े को शामिल करने को ले कर है।
