Lucknow, India

अध्ययन में खुलासा: लोग अब भी जेब से खर्च कर रहे इलाज का आधा पैसा, 80 फीसदी विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली

Published 14 June 2026 · india

यह जानकारी हाल ही में एम्स कल्याणी (पश्चिम बंगाल), एम्स मंगलगिरी (आंध्र प्रदेश) और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (दिल्ली) के विशेषज्ञों के अध्ययन से सामने

यह जानकारी हाल ही में एम्स कल्याणी (पश्चिम बंगाल), एम्स मंगलगिरी (आंध्र प्रदेश) और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (दिल्ली) के विशेषज्ञों के अध्ययन से सामने आई है। "पब्लिक हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन इन इंडिया" नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की दिशा के बारे में बताया गया है।रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चिकित्सकों की कमी का सबसे अधिक असर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में देखने को मिलता है, जहां लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी संविदा पर कार्यरत हैं, जिससे नौकरी की अस्थिरता और कर्मचारियों के पलायन की समस्या बनी रहती है।रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई उपकेंद्र आज भी किराये या जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में लैब और जांच सुविधाओं की कमी है, जबकि कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ, रक्त भंडारण इकाई और नवजात शिशु देखभाल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के तहत स्थापित कई शहरी स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त स्टाफ और उपकरणों के अभाव से जूझ रहे हैं।रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 2.1% है, जबकि वैश्विक औसत 5 से 6% के बीच है। आंकड़ों को देखें तो 2022-23 में सरकारी स्वास्थ्य व्यय प्रति व्यक्ति लगभग 2,800–2,900 रुपये सालाना तक पहुंच गया था।

सरकार एक भारतीय नागरिक के स्वास्थ्य पर करीब आठ रुपये प्रतिदिन खर्च करती है।स्वास्थ्य सेवाओं और परिणामों में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य स्वास्थ्य सूचकांकों में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि बिहार और यूपी जैसे राज्यों को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

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