Maharashtra: बिना अनुमति लंबी गैरहाजिरी गंभीर कदाचार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवा से हटाने का फैसला बरकरार रखा
अदालत ने कहा, 'इस प्रकार की अनधिकृत अनुपस्थिति जनहित के प्रतिकूल है और गंभीर कदाचार की श्रेणी में आती है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी
अदालत ने कहा, 'इस प्रकार की अनधिकृत अनुपस्थिति जनहित के प्रतिकूल है और गंभीर कदाचार की श्रेणी में आती है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी सही है।' कोर्ट ने बाकुली की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आरबीआई का फैसला कानूनी तौर पर गलत नहीं है।बाकुली ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फरवरी 2023 में जारी आरबीआई के उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत उन्हें अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी।
उन्होंने दिसंबर 2020 से रोके गए वेतन और अन्य भत्तों के भुगतान की भी मांग की थी।याचिका के अनुसार, बाकुली वर्ष 2013 से आरबीआई में कार्यरत थे और जनवरी 2018 में उन्हें वरिष्ठ सहायक बनाया गया था। उन्होंने कई बार अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए कोलकाता तबादले का अनुरोध किया, लेकिन आरबीआई ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की। मार्च 2020 से वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने लगे। आरबीआई ने उन्हें कई बार पत्र भेजकर काम पर लौटने या मेडिकल प्रमाणपत्र के साथ अवकाश आवेदन देने को कहा, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।इसके बाद आरबीआई ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर विभागीय जांच शुरू की।
बैंक के अनुसार, बाकुली ने नोटिस का जवाब नहीं दिया और न ही जांच बैठकों में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरबीआई ने उनके खिलाफ अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा लागू कर दी।बाकुली का कहना था कि कोविड-19 महामारी के दौरान वह अपने माता-पिता के पास कोलकाता चले गए थे, इसलिए मुंबई लौटकर
ड्यूटी जॉइन नहीं कर सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि विभागीय कार्यवाही के दौरान उन्हें कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने उनका उपयोग नहीं किया।
