Maharashtra: ऑटिज्म से ग्रस्त युवती के यौन शोषण के आरोपी को नहीं मिली जमानत, मुंबई कोर्ट ने खारिज की अर्जी
मुंबई की एक सत्र अदालत ने ऑटिज्म से पीड़ित एक युवती के कथित यौन शोषण के आरोपी व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया
मुंबई की एक सत्र अदालत ने ऑटिज्म से पीड़ित एक युवती के कथित यौन शोषण के आरोपी व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप केवल शारीरिक शोषण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पीड़िता के परिवार द्वारा आरोपी पर किए गए भरोसे के दुरुपयोग से भी जुड़े हुए हैं। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अश्विनी वी. कस्तुरे ने शुक्रवार को पारित अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी ने पीड़िता और उसके परिवार के विश्वास का गलत फायदा उठाया। ऐसे में उसे जमानत देना उचित नहीं होगा।अभियोजन पक्ष के अनुसार, अक्तूबर 2023 में पीड़िता के पिता ने आरोपी को अपनी बेटी से मिलवाया था और उसकी देखभाल करने का अनुरोध किया था।
युवती वाणिज्य (कॉमर्स) की छात्रा थी और पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करती थी। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों ने उसके माता-पिता को पहले ही बताया था कि ऑटिज्म की वजह से उसे सामाजिक परिस्थितियों में सही और गलत का पूर्ण आकलन करने में कठिनाई हो सकती है।पुलिस जांच में आरोप लगाया गया है कि आरोपी युवती को कई लॉज में लेकर गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। जांच एजेंसियों का दावा है कि आरोपी को यह जानकारी थी कि युवती की मानसिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह कानूनी रूप से वैध सहमति दे सके। यह मामला अगस्त 2025 में सामने आया, जब युवती ने अपने एक रिश्तेदार को आरोपी के साथ अपने संबंधों के बारे में बताया। इसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई और जांच शुरू हुई।चेंबूर निवासी आरोपी को 6 जनवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।
मामले की जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र (चार्जशीट) भी दाखिल कर दिया है।आरोपी के वकील ने अदालत में दावा किया कि मार्च 2025 में युवती ने आरोपी से पांच लाख रुपये की मांग की थी। जब आरोपी ने पैसे देने से इनकार कर दिया, तभी उसके खिलाफ यौन शोषण की शिकायत दर्ज कराई गई। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से बने थे। इसके समर्थन में लॉज प्रबंधकों के बयान का हवाला दिया गया, जिनके अनुसार युवती ने स्वयं अपनी पहचान पत्र का उपयोग कर कमरों में चेक-इन किया था।अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार युवती को "ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर- माइल्ड" (हल्का ऑटिज्म) निदान किया गया है। न्यायालय ने कहा कि यह तय करना कि ऑटिज्म की स्थिति इतनी गंभीर थी या नहीं कि वह कानूनी रूप से वैध सहमति देने की क्षमता को प्रभावित करती हो, केवल मुकदमे के दौरान विशेषज्ञों की गवाही और जिरह के आधार पर ही संभव होगा।अदालत ने यह भी माना कि आरोपी और पीड़िता एक ही इलाके में रहते हैं।
ऐसी स्थिति में आरोपी के रिहा होने पर गवाहों को प्रभावित करने या पीड़िता पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी और उसे राहत देने से इनकार कर दिया।
