Explainer: 50 साल बाद भी चर्चा में क्यों है इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला? इंदिरा को दोषी ठहराने के बाद क्या हुआ?
25 जून 1975 (दिन): रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने
25 जून 1975 (दिन): रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग दोहराई और 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। जेपी ने पुलिस और सेना से भी संविधान और नैतिकता के अनुरूप काम करने की अपील की। 25 जून 1975 (शाम): आपातकाल की तैयारी प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति की समीक्षा की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंतरिक आपातकाल लगाने का कानूनी मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की सिफारिश भेजी गई। 25 जून 1975 (रात): राष्ट्रपति की मंजूरी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए और देश में "आंतरिक अशांति" (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी।
26 जून 1975 की सुबह: देश को आपातकाल की जानकारी इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के अनुसार, आपातकाल लागू होने के बाद इंदिरा गांधी ने देश और विदेश में इसे उचित ठहराने की व्यापक कोशिश की। उन्होंने अपनी मित्र और कलाकार पुपुल जयकर को लिखे एक संदेश में कहा कि बढ़ती हिंसा, नफरत और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए आपातकाल आवश्यक था। उन्होंने दावा किया कि केवल लगभग 900 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अधिकांश को जेलों में नहीं बल्कि आरामदायक स्थानों पर रखा गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश में शांति और अमन-चैन का माहौल है व आपातकाल का उद्देश्य देश को सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर वापस ले जाना है। हालांकि गुहा लिखते हैं कि वास्तविकता इससे अलग थी। देशभर में पुलिस विपक्षी नेताओं, छात्र कार्यकर्ताओं, मजदूर संगठनों और कांग्रेस विरोधी समूहों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर रही थी।
जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे बड़े नेताओं को हिरासत में लिया गया, जबकि हजारों लोगों को मीसा (MISA) कानून के तहत बिना मुकदमे जेलों में बंद कर दिया गया। गुहा के अनुसार, गिरफ्तार लोगों की संख्या इंदिरा गांधी द्वारा बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक थी। गुहा बताते हैं कि आपातकाल के शुरुआती महीनों में इंदिरा गांधी ने विदेशी मीडिया को कई साक्षात्कार दिए। उन्होंने लंदन के संडे टाइम्स से कहा कि आपातकाल सत्ता बचाने के लिए नहीं बल्कि जयप्रकाश नारायण द्वारा पैदा की गई कथित असंवैधानिक चुनौती का जवाब था। उन्होंने दावा किया कि देश को अव्यवस्था और विघटन से बचाने व आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। Saturday Review को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उसकी रक्षा के लिए लगाया गया है।
उन्होंने पश्चिमी मीडिया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की तुलना पाकिस्तान और चीन जैसे अधिनायकवादी देशों से करना अनुचित है। रामचंद्र गुहा के अनुसार, आपातकाल के दौरान सरकार ने अनुशासन और नैतिकता को प्रमुख नारे के रूप में प्रचारित किया। सरकारी प्रचार तंत्र ने “अनुशासन ही देश को महान बनाता है”, “काम ज्यादा, बातें कम” और ''स्वदेशी खरीदें, भारतीय बनें'' जैसे नारे पूरे देश में फैलाए। इसके साथ ही इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बड़े-बड़े होर्डिंगों और सरकारी प्रचार में उन्हें व्यवस्था और स्थिरता की गारंटी के रूप में दिखाया गया।
