China-Gakao vs NEET: अपनी परीक्षा के बहाने भारत को घेरने की ताक में चीन, संसदीय समिति की नसीहत को बनाया ढाल
जख्म पर नमक छिड़कने की चीनी टाइमिंग बच्चे अनिश्चितता के भंवर में, नेता जुबानी जंग में लोहे के पर्दे के पीछे छुपा गाओकाओ का सच
जख्म पर नमक छिड़कने की चीनी टाइमिंग बच्चे अनिश्चितता के भंवर में, नेता जुबानी जंग में लोहे के पर्दे के पीछे छुपा गाओकाओ का सच चीन खुद को परीक्षा शुचिता का मसीहा साबित करने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन उसकी अपनी व्यवस्था का सच लोहे के पर्दे के पीछे कैद है। गाओकाओ परीक्षा में भी प्रॉक्सी परीक्षार्थियों का संगठित सिंडिकेट, हाई-टेक ब्लूटूथ डिवाइस से सामूहिक नकल और अधिकारियों की मिलीभगत से पेपर लीक होने का एक लंबा और काला इतिहास रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि चीन एक अधिनायकवादी कम्युनिस्ट देश है, जहाँ सच बोलने वाली जुबानों को खामोश कर दिया जाता है और राज्य के पास खबरों को दफन करने की असीमित ताकत है। वहाँ की कमियों पर इंटरनेशनल मीडिया या सोशल मीडिया में चर्चा तक करने की आजादी किसी नागरिक को नहीं है। ऐसे में अपनी दमनकारी गोपनीयता को अनुशासन का नाम देकर भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र को ज्ञान देना चीन का दोहरा मापदंड है।
लोकतंत्र कमजोरी नहीं, पर आत्ममंथन जरूरी यह पोस्ट महज एक संयोग नहीं, बल्कि बीजिंग की सोची-समझी कूटनीतिक खुराफात का हिस्सा है। ये पोस्ट ठीक उसी समय दागा गया जब भारत की संसदीय स्वास्थ्य समिति ने एनटीए और संबंधित मंत्रालयों के अधिकारियों को तलब कर नसीहत दी थी कि इतनी बड़ी परीक्षाओं के पारदर्शी संचालन के लिए हमें चीन की व्यवस्था से सीखना चाहिए। हमारी अपनी संसदीय समिति ने आत्ममंथन के लिए जिस मॉडल का जिक्र किया, चीन ने अगले ही दिन भारत को वैश्विक स्तर पर नीचा दिखाने के लिए उसे एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह भुना लिया। जब देश अपने बच्चों के भविष्य को लेकर संवेदनशील और फिक्रमंद हो, तब एक विदेशी दूतावास द्वारा इस तरह जख्मों पर नमक छिड़कना उसकी शातिर फितरत को ही बयां करता है।पेपर लीक के आरोप लगे, सीबीआई जांच शुरू हुई और एनटीए के शीर्ष अधिकारियों पर गाज गिरी। व्यवस्था को दोबारा परीक्षा कराने के दौर से गुजरना पड़ रहा है।
उधर सीबीएसई के 17.50 लाख बारहवीं के छात्र डिजिटल मूल्यांकन की गड़बड़ियों से अलग परेशान हैं। साढ़े चार लाख छात्रों ने आंसर शीट की पीडीएफ मांगी, तो 11.50 लाख से अधिक ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। विडंबना देखिए कि देश के इन नौनिहालों के लिए न तो सत्ता पक्ष की ओर से कोई संवेदनशीलता दिखी और न ही विपक्ष की ओर से कोई रचनात्मक समाधान आया।राहुल गांधी से लेकर तमाम विपक्षी नेता शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगते रहे। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है और काम भी। लेकिन जो काम नहीं हुआ, वह यह कि किसी एक भी विपक्षी दल ने यह आगे बढ़कर नहीं कहा कि संकट की इस घड़ी में हम दलगत राजनीति से ऊपर उठकर परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए सरकार के साथ बैठने को तैयार हैं। इस्तीफे की मांग करना महज सियासत है, जबकि बच्चों का भविष्य बचाना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
दोनों का फर्क हमारे नेताओं को समझना होगा। चीनी अधिकारी ने जब लिखा कि 'पूरा देश एकजुट हो गया', तो यह तीखा व्यंग्य सिर्फ सरकार की नाकामी पर नहीं, बल्कि भारत के बंटे हुए राजनीतिक नेतृत्व पर भी था।भारत में गड़बड़ी होने पर खबरें छपती हैं, विपक्ष संसद सिर पर उठाता है और अदालतें सरकार को कटघरे में खड़ा करती हैं। यह हमारी व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की वो ताकत है जो चीन के पास कभी नहीं हो सकती। लेकिन इस ताकत की सार्थकता तभी है जब हम इस खुलेपन का इस्तेमाल व्यवस्थागत सुधार के लिए करें, न कि केवल एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से नीचा दिखाने और दुश्मनों को हंसने का मौका देने के लिए।
