Lucknow, India

SC: देश में गिरते लिंगानुपात पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी चिंता, कहा- जब तक सोच नहीं बदलती, कड़े कानून जरूरी

Published 11 June 2026 · india

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक डॉक्टर की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियां कीं। अदालत ने इस

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक डॉक्टर की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियां कीं। अदालत ने इस बात पर दुख जताया कि कई राज्य अभी भी राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक समाज की सोच में बदलाव नहीं आता तब तक पीसीपीएनडीटी अधिनियम को पूरी सख्ती के साथ लागू करने की जरूरत है।पीठ ने कहा कि जिस तरह से लिंगानुपात गिर रहा है उससे साफ पता चलता है कि समाज में लडके के प्रति प्राथमिकता अभी भी बनी हुई है।

यह स्थिति अवैध तरीके से लिंग चयन की प्रथाओं की मौजूदगी को भी दर्शाती है। अदालत ने कहा कि सरकार बेटी बचाओ बेटी पढाओ और लाडली लक्ष्मी जैसी योजनाओं से भेदभाव मिटाने की कोशिश कर रही है।पीठ ने आगे कहा कि देश की आजादी के 75 साल बाद भी सार्वजनिक जगहों पर लडकियों की सुरक्षा और शिक्षा से जुडे दिखते हैं। यह इस बात का सबूत है कि हालात पहले से बेहतर तो हुए हैं लेकिन अभी भी सुधार की काफी गुंजाइश बाकी है। सच्ची समानता तभी आएगी जब लडकियों के पैदा होने के अधिकार पर सवाल उठना बंद हो जाएगा।अपने फैसले के दौरान उच्चतम न्यायालय ने भारतीय संस्कृति और साहित्य का भी जिक्र किया।

पीठ ने मनुस्मृति के प्रसिद्ध श्लोक यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता को उद्धृत किया। इसका अर्थ है कि जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने सुभद्रा कुमारी चौहान की मशहूर कविता बालिका का परिचय का भी उल्लेख किया।पीठ ने कहा, 'कानूनों का सख्त होना तब तक जरूरी है जब तक महिला को कमजोर समझने वाली पुरानी धारणा पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाती।'यह पूरा मामला एक डॉक्टर की अपील से जुडा था। डॉक्टर ने गर्भ धारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम के उल्लंघन से जुडे एक मामले में आदेश को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर की इस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिंग चयन और भ्रूण हत्या जैसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनी सख्ती बहुत जरूरी है। अदालत ने कहा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लडकियों को जो भेदभाव झेलना पडता है उसे खत्म करना ही न्यायपालिका का उद्देश्य है।

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