Explainer: मणिपुर में छह हत्याएं, क्यों नहीं थम रहा मैतेई-कुकी संघर्ष; हिंसा पर संसद में क्या बोले थे शाह?
मणिपुर में जारी हिंसा कोई अचानक भड़की घटना नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराने जातीय अविश्वास, भौगोलिक विभाजन और संसाधनों की लड़ाई का नतीजा है।
मणिपुर में जारी हिंसा कोई अचानक भड़की घटना नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराने जातीय अविश्वास, भौगोलिक विभाजन और संसाधनों की लड़ाई का नतीजा है। राज्य में इस तरह की घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। मई 2023 में शुरू हुआ यह दौर आज 2026 में भी जारी है। आइए जानते हैं मणिपुर में संघर्ष का इतिहास क्या है? कब कौन से आंदोलन हुआ? उनका नतीजा क्या हुआ?मणिपुर में राज्य के बीच का जो समतल हिस्सा (इंफाल घाटी) है, वह कुल क्षेत्रफल का सिर्फ दस प्रतिशत है। लेकिन यहां राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी रहती है। इस आबादी में मुख्य रूप से मैतेई समुदाय के लोग हैं, जो अधिकांश हिंदू हैं। वहीं घाटी को चारों तरफ से घेरने वाले पहाड़ राज्य का 90 प्रतिशत हिस्सा हैं। यहां राज्य की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है, जिसमें कुकी और नगा जनजातिया शामिल हैं, जो मुख्य रूप से ईसाई हैं। भूगोल और आबादी का यह वर्गीकरण विवाद की मुख्य वजह है।मणिपुर की पहाड़ियों और घाटियों में 35 से ज्यादा समुदाय रहते हैं। यहां नगा, कुकी और मैतेई जैसे समुदायों और विभिन्न विद्रोही समूहों के बीच संघर्ष का बहुत पुराना इतिहास रहा है। राज्य में अशांति का दौर 50 के दशक के अंत में शुरू हुआ था। नगा विद्रोही समूह 'एनएससीएन-आईएम' (NSCN-IM) लंबे समय से नगा आबादी वाले इलाकों को एक करने की मांग कर रहा है। इस गुट ने 1997 में भारत सरकार के साथ युद्धविराम समझौता किया था। दूसरी ओर, कुकी समुदाय भी अंग्रेजों के समय से ही अपने अधिकारों और जमीन के लिए लड़ाई लड़ रहा है।मैतेई समुदाय के भीतर भी असंतोष की जड़ें पुरानी हैं। आजादी के बाद जब मणिपुर के राजा बोधचंद्र और भारत सरकार के बीच विलय का समझौता हुआ, तो मैतेई समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया। 1964 में 'यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट' (UNLF) बना, जिसने भारत से अलग होने की मांग रखी। इसके बाद पीएलए (PLA) और प्रेपाक (PREPAK) जैसे कई अन्य विद्रोही समूह भी सामने आए। इन समूहों के दो मुख्य उद्देश्य थे- भारत से आजादी और नगा विद्रोही समूहों का मुकाबला करना।वहीं कुकी-जोमी समूहों का उदय नगा हमलों के जवाब में हुआ था। आरोपों के अनुसार, 1993 में एनएससीएन-आईएम ने कुकी समुदाय का नरसंहार किया, जिससे हजारों लोग बेघर हो गए।
इस घटना के बाद कुकी-जोमी जनजातियों ने अपने हथियारबंद समूह बना लिए। इसी दौरान मैतेई और मैतेई पंगल (मुस्लिम) समुदाय के बीच भी हिंसक झड़पें हुईं। इसके बाद 'पीपुल्स यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट' नाम का संगठन बना, जो अब सक्रिय नहीं है। इस तरह मणिपुर लंबे समय से अलग-अलग गुटों की आपसी लड़ाई और हिंसा का सामना कर रहा है।मणिपुर में अलगाववादी गतिविधियों को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1958 में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) बनाया। शुरुआत में इसे नगालैंड और मणिपुर के कुछ ही हिस्सों में लागू किया गया था। लेकिन बाद में बिगड़ते हालात को देखते हुए इसे पूरे राज्य में लगा दिया गया। 1980 के दशक में स्थिति और ज्यादा खराब हो गई, जिसके बाद मणिपुर को 'अशांत क्षेत्र' घोषित कर दिया गया।शांति बहाली के लिए 2008 में एक बड़ा कदम उठाया गया। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और कुकी-जोमी विद्रोही समूहों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसे 'सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन' (SOO) कहा जाता है। इस समझौते के बाद शांति वार्ता का रास्ता खुला। जैसे-जैसे कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ, राज्य के कई हिस्सों से AFSPA हटा लिया गया। हालांकि, घाटी में सक्रिय विद्रोही समूहों ने कभी भी सरकार के साथ किसी शांति वार्ता में हिस्सा नहीं लिया और न ही कोई समझौता किया। ये गुट आज भी सक्रिय बने हुए हैं।कुकी-जोमी विद्रोही समूहों का इतिहास भी काफी बदला है। शुरुआत में यह आंदोलन दूसरे गुटों के हमलों से बचने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन धीरे-धीरे यह एक अलग 'कुकीलैंड' की मांग में बदल गया। इन गुटों ने भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के कुकी-जोमी बसे हुए क्षेत्रों में फैले हुए एक काल्पनिक देश को 'कुकीलैंड' कहना शुरू कर दिया था। समय के साथ, इनकी मांग एक अलग राज्य के रूप में बदल गई।मणिपुर का चुराचांदपुर जिला उग्रवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां आज भी 20 से अधिक उग्रवादी गुट सक्रिय हैं। इन समूहों में कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और इसकी सैन्य शाखा कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी प्रमुख हैं। इनके अलावा जोमी री-यूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन, जोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी, कुकी नेशनल फ्रंट, कुकी नेशनल लिबरेशन फ्रंट, यूनाइटेड कुकी लिबरेशन फ्रंट और कुकी नेशनल आर्मी जैसे गुट इस क्षेत्र में अपनी पकड़ रखते हैं।घाटी के विद्रोही समूहों में यूएनएलएफ (UNLF) लंबे समय तक सबसे ताकतवर संगठन रहा है।
ये गुट सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करने और आईईडी (IED) लगाने जैसी घटनाओं में शामिल रहे हैं। समय के साथ केसीपी (KCP) और केवाईकेएल (KYKL) जैसे अन्य शक्तिशाली समूह भी सामने आए। ये समूह फिलहाल म्यांमार सीमा के पास बने शिविरों से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में घाटी के ये समूह कमजोर हुए हैं। यूएनएलएफ अब अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है क्योंकि आपसी झगड़ों की वजह से यह तीन हिस्सों में बंट गया है। नगा समूहों की बात करें तो एनएससीएन-आईएम (NSCN-IM) सबसे बड़ा संगठन है। इसका मुख्य प्रभाव उखरुल और सेनापति जिलों में है।इन सभी गुटों की मांगें अलग-अलग रही हैं। एनएससीएन-आईएम की मुख्य मांग पूर्वोत्तर के नगा बहुल इलाकों को एक करने की है। यह संगठन केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहा है। भारत सरकार और इस गुट के बीच साल 2001 में हुए संघर्ष विराम समझौते को समय-समय पर आगे बढ़ाया गया है।कुकी एक पहाड़ी जनजाति है। ये लोग म्यांमार सीमा के पास पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। नगा और कुकी समुदायों के बीच विवाद आजादी से पहले ही शुरू हो गया था। साल 1990 में जमीन को लेकर दोनों पक्षों में भारी संघर्ष हुआ। इस संघर्ष का सबसे भयानक रूप 13 सितंबर 1993 को दिखा। आरोप है कि नगा विद्रोही गुट एनएससीएन-आईएम (NSCN-IM) ने मणिपुर की पहाड़ियों में करीब 115 कुकी नागरिकों की हत्या कर दी। हालांकि, इस संगठन ने इन आरोपों को हमेशा गलत बताया है। कुकी समुदाय का दावा है कि इस हिंसा में उनके 350 गांव पूरी तरह बर्बाद हो गए। इस दौरान 1,000 से ज्यादा लोगों की जान गई और लगभग 10,000 लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। जमीन और अधिकारों की यह लड़ाई आज भी इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।मणिपुर में एक पुराना कानून है कि घाटी में रहने वाले गैर-जनजाति (जैसे मैतेई) लोग पहाड़ों में जमीन नहीं खरीद सकते। जबकि पहाड़ी जनजातियां घाटी में आकर जमीन खरीद सकती हैं। मैतेई समुदाय को लगता है कि 10 प्रतिशत जमीन पर उनकी इतनी बड़ी आबादी सिमट कर रह गई है, जबकि कुकी और नागा समुदायों का मानना है कि उनकी पैतृक पहाड़ी जमीनों की रक्षा के लिए यह कानून जरूरी है।
कुकी और नगा पारंपरिक रूप से एक-दूसरे का विरोध करते आये हैं। हालांकि जब बात मैतेई के खिलाफत की आती है, तो दोनों समुदाय के लोग एकजुट हो जाते हैं।इन्हीं चिंताओं को लेकर मैतेई समुदाय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि उन्हें जनजातीय वर्ग (ST) में शामिल किया जाए। याचिका में दलील दी गई कि 1949 में मणिपुर के भारत में विलय से पहले मैतेई समुदाय को एक जनजाति के रूप में ही मान्यता मिली हुई थी। हाईकोर्ट ने 19 अप्रैल को इस याचिका पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह मैतेई समुदाय को जनजातीय वर्ग में शामिल करने की मांग पर विचार करे। इसके लिए सरकार को चार हफ्ते का समय दिया गया। हाईकोर्ट के इसी फैसले के बाद राज्य के अन्य आदिवासी समूहों ने विरोध शुरू कर दिया, जिसने बाद में हिंसा का रूप ले लिया। जोकि मई 2023 से अब तक जारी है।वहीं, इस मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जानकारी देते हुए कहा था कि, हाई कोर्ट के एक फैसले की वजह से मणिपुर के दो समुदायों के बीच आरक्षण संबंधी विवाद के कारण जातीय हिंसा शुरू हुई थी। उन्होंने कहा कि न तो यह दंगे हैं और न ही आतंकवाद है, बल्कि हाई कोर्ट के एक फैसले की व्याख्या के कारण दो समुदायों के बीच जातीय हिंसा है। उन्होंने कहा, हिंसा होनी ही नहीं चाहिए और जातीय हिंसा को किसी पार्टी के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। उन्होंने सदन को बताया कि मणिपुर में 1993 में जातीय हिंसा हुई, 1993 से 1998 तक नागा-कुकी संघर्ष हुआ, जिसमें 750 मौतें हुईं और छिटपुट घटनाएं एक दशक तक चलती रहीं। गृह मंत्री ने कहा, सरकार मानती है कि ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए, लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण फैसला आया, जिसके चलते यह हिंसा हुई और उसे तत्काल नियंत्रण में लाया गया। उन्होंने कहा कि हिंसा में जो 260 लोगों मौत हुई हैं उनमें से 80 प्रतिशत लोगों की मौत पहले एक महीने के अंदर हुईं, जबकि बाकी घटनाएं बाद के महीनों में हुईं।
