Lucknow, India

SC: आपराधिक अपीलों में तीसरे जज की शक्ति से जुड़ा मामला, शीर्ष कोर्ट ने बड़ी पीठ को भेजा

Published 11 June 2026 · india

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस विषय पर वर्ष 1999 में आए सज्जन सिंह

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस विषय पर वर्ष 1999 में आए सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले के निर्णय की दोबारा समीक्षा की जरूरत है। पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 392 की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, जिनका हल बड़ी पीठ की ओर से किया जाना उचित होगा। अदालत ने कहा कि यह तय किया जाना जरूरी है कि धारा 392 के तहत तीसरे जज के समक्ष केवल वही बिंदु भेजे जाते हैं जिन पर दो जजों के बीच मतभेद हो, या फिर वह पूरी अपील की स्वतंत्र रूप से सुनवाई कर सकता है।यह मामला उत्तर प्रदेश के एक हत्या प्रकरण से जुड़ा है।

वर्ष 1991 के इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने रस्तोगी बंधुओं अनिल, अजय और अतुल को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी अपीलों पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट की खंडपीठ में जस्टिस भंवर सिंह ने अनिल और अजय की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए अतुल को बरी कर दिया था। वहीं जस्टिस देवी प्रसाद सिंह ने तीनों भाइयों की दोषसिद्धि को सही माना। दोनों जजों के बीच मतभेद होने पर मामला तीसरे जज, तत्कालीन जस्टिस विक्रम नाथ के पास भेजा गया।

तीसरे जज ने अतुल को बरी करने के साथ-साथ अनिल और अजय की दोषसिद्धि भी रद्द कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अनिल और अजय के मामले में दोनों जज उनकी दोषसिद्धि पर सहमत थे, इसलिए उनकी अपीलें तीसरे जज के समक्ष नहीं जानी चाहिए थीं।अदालत ने कहा कि यदि तीसरे जज को पूरी अपील पर पुनर्विचार की असीमित शक्ति दी जाती है तो इससे न्यायिक अनुशासन, न्यायिक मर्यादा और आपराधिक न्याय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

अब इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर बड़ी पीठ की राय आने के बाद संबंधित अपीलों पर अंतिम फैसला सुनाया जाएगा।

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