Lucknow, India

Explainer: सदन दर सदन टूटती टीएमसी, काकोली के दावे निकले सही तो क्या ममता का होगा उद्धव जैसा हाल?

Published 8 June 2026 · india

दल-बदल कानून आया क्यों? बात साल 1967 की है। हरियाणा में सत्ता संघर्ष चल रहा था।

दल-बदल कानून आया क्यों? बात साल 1967 की है। हरियाणा में सत्ता संघर्ष चल रहा था। विधायक आए दिन पाला बदल रहे थे। हर दिन सरकार के साथ और खिलाफ होने वाले विधायकों के नाम सामने आते थे। इसी दौरान हसनपुर के निर्दलीय विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार गुट बदल लिया था। इसके बाद भारतीय राजनीति में "आया राम, गया राम" शब्द प्रचलित हो गया। उस दौर में कई राज्यों में विधायकों की खरीद-फरोख्त और बार-बार सरकारें गिराने की घटनाएं सामने आईं। इसी राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी। इसे ही दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। अलग-अलग मौकों पर इस कानून में कई बदलाव भी किए गए। कब लागू होता है यह कानून? किसी सांसद या विधायक को दल-बदलू माना जा सकता है अगर वह स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे। किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए।

पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करे। मतदान से अनुपस्थित रहे जबकि पार्टी ने उपस्थित रहने का निर्देश दिया हो। उसके सार्वजनिक आचरण से यह साबित हो कि वह अपनी पार्टी छोड़ चुका है। सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि केवल लिखित इस्तीफा ही जरूरी नहीं है। अगर किसी नेता की गतिविधियां दूसरी पार्टी के समर्थन में दिखती हैं, तो इसे भी "स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना" माना जा सकता है। दल-बदल का कानून लगेगा या नहीं ये फैसला कौन करता है? लोकसभा सांसदों के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ये फैसला करते हैं। वहीं, राज्यसभा सदस्यों के मामले में राज्यसभा के सभापति ये फैसला लेते हैं। इसी तरह विधायकों के मामले में विधानसभा अध्यक्ष को यह तय करना होता है। अगर किसी सदस्य के खिलाफ दल-बदल की शिकायत की जाती है तो अंतिम फैसला संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी लेते हैं। हालांकि उनके फैसले को बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

अगर बागी गुट 2/3 संख्या नहीं जुटा पाता तो क्या होता है? अगर बगावत करने वाले सांसद या विधायक अकेले या छोटे समूह में पार्टी छोड़ते हैं और उसके पास पार्टी के विधायी दल की कुल संख्या का दो-तिहाई समर्थन नहीं होता है, तो उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है। उसकी सीट खाली घोषित की जा सकती है। यही वजह है कि किसी भी राजनीतिक टूट या बगावत में सबसे ज्यादा चर्चा 2/3 संख्या के गणित की होती है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों ने भी तो बगावत की थी, उनकी सदस्यता क्यों नहीं गई? पिछले साल सपा ने भाजपा को समर्थन देने के आरोप में अपने तीन विधायकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इनमें अयोध्या के गोसाईंगंज सीट से जीते अभय सिंह, अमेठी की गौरीगंज सीट से जीते राकेश प्रताप सिंह और रायबरेली की ऊंचाहार सीट से जीते मनोज पांडेय शामिल थे। इन सभी की विधानसभा सदस्यता नहीं गई। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने इन तीनों विधायकों को असंबद्ध सदस्य घोषित कर दिया।

अब मनोज पांडेय योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट का हिस्सा हैं। दरअसल दल-बदल विरोधी कानून के तहत केवल पार्टी से निकाले जाने भर से किसी विधायक या सांसद की सदस्यता समाप्त नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित हुआ है और बाद में पार्टी उसे निष्कासित कर देती है, तो वह सदन में उस दल से निर्वाचित सदस्य ही माना जाता है और "अनअटैच्ड सदस्य" के रूप में अपनी सीट बरकरार रख सकता है। उसकी सदस्यता तभी खतरे में पड़ती है जब वह स्वयं पार्टी छोड़ दे, किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए या ऐसे कदम उठाए जिन्हें मूल पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से त्यागना माना जाए। यही वजह है कि निष्कासन और दल-बदल को कानून अलग-अलग परिस्थितियों के रूप में देखता है।

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