'जबरदस्ती के रिश्ते से कर दो आजाद', कोर्ट में लंबे समय से चल रहे वैवाहिक मुकदमों पर SC का फैसला
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक मुकदमों के लंबे खिंचने पर टिप्पणी करते हुए अपने एक फैसले में कहा है कि वैवाहिक मुकदमों का लंबे समय तक लंबित रहना, केवल कागजों पर शादी को हमेशा के लिए बनाए रखने जैसा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पक्षों
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक मुकदमों के लंबे खिंचने पर टिप्पणी करते हुए अपने एक फैसले में कहा है कि वैवाहिक मुकदमों का लंबे समय तक लंबित रहना, केवल कागजों पर शादी को हमेशा के लिए बनाए रखने जैसा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पक्षों और समाज के हित में है कि उन मामलों में पक्षों के बीच संबंध समाप्त कर दिए जाएं, जहां मुकदमा काफी लंबे समय से लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात 15 साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे जोड़े की शादी को खत्म करते हुए कही। जबरदस्ती के रिश्ते से आजाद कर दो कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंध को बेवजह लंबा खींचने से न केवल एक मृत रिश्ते में हताशा और बढ़ेगी, जो पहले ही सड़ चुका है और दिन-ब-दिन और भी खराब होता जा रहा है, बल्कि इससे जीवन में एक घिनौना सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और मानसिक खालीपन भी पैदा होगा।
इसका परिणाम ये होगा कि व्यक्ति को फलने फूलने के लिए वह स्वतंत्र और मुक्त वातावरण नहीं मिल पाएगा, जिसकी हर इंसान अपने तन और मन से चाहत रखता है। पीठ ने कहा कि इस कोर्ट की राय है कि न्यायालय में लंबित ऐसे वैवाहिक मुकदमों को समाप्त किया जाना चाहिए और पक्षों को इस बासी और ठहरे हुए रिश्ते से मुक्ति प्रदान की जानी चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शादी को समाप्त घोषित कर दिया। ये फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और एजी मसीह की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली पत्नी की अपील खारिज करते हुए दिया। हाई कोर्ट ने पति की अपील मंजूर करते हुए तलाक का आदेश दिया था।
खबरें और भी सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अदालतों ने बार बार ये स्थापित किया है कि शारीरिक नजदीकी से इन्कार करना गंभीर मानसिक पीड़ा देता है और शादी की बुनियाद को कमजोर करता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया था कि हाई कोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए कई आधारों पर तलाक मंजूर किया था, जिसमें पत्नी द्वारा पति के साथ की गई क्रूरता भी शामिल थी। पत्नी ने कई मौकों पर शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया था। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह माना गया है कि वैवाहिक अधिकारों से इनकार करना, जिसमें बिना किसी सही वजह के बार बार शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना भी शामिल है, मानसिक क्रूरता माना जाता है। 15 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) (आइ, ए) के तहत ये तलाक का वैध आधार है।
इस मामले में पति और पत्नी दोनों डॉक्टर हैं और राजस्थान व गुजरात में सरकारी नौकरी कर रहे हैं। उनकी शादी 2007 में हुई थी। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि दोनों पक्ष 15 साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे हैं। उनके कोई बच्चा नहीं है और अदालत की बार बार कोशिशों के बावजूद उनके बीच कोई सुलह नहीं हो पाई थी। कोर्ट ने कहा कि शादी अपने कानूनी और संवैधानिक दायरे में, कभी भी सिर्फ व्यक्तिगत अधिकारों के एक अनुबंध आधारित मेल तक सीमित नहीं की जा सकती और न ही इसे वैवाहिक अधिकारों की याचिका के संकीर्ण नजरिये से ही देखा जा सकता है।
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