Lucknow, India

भाषाई संकीर्णता से राष्ट्रीय एकात्म की ओर

Published 1 June 2026 · india

मनु त्यागी। भारत जैसे महाद्वीप-सदृश देश में, घाट-घाट पर पानी और कोस-कोस पर वाणी बदलती है। यहां हर कुछ किलोमीटर पर पानी और बोली दोनों का व्यवहार बदल जाता है, मतलब वहां की सामाजिकता का परछाया पानी और वाणी दोनों पर होता है। या कहें कि पानी-वाणी ही समाज की

मनु त्यागी। भारत जैसे महाद्वीप-सदृश देश में, घाट-घाट पर पानी और कोस-कोस पर वाणी बदलती है। यहां हर कुछ किलोमीटर पर पानी और बोली दोनों का व्यवहार बदल जाता है, मतलब वहां की सामाजिकता का परछाया पानी और वाणी दोनों पर होता है। या कहें कि पानी-वाणी ही समाज की परछाईं और छाप होते हैं। वैसे भी भाषा सिर्फ अपने संवाद के माध्यम तक सीमित नहीं रही। वो तो संवाद से संवेदनाओं तक की गहराई में मौन रहकर भी उतरी है। त्रि-भाषा नीति कक्षा 9-10 के लिए अनिवार्य अस्मिता, संस्कृति, इतिहास और दुर्भाग्य से भारत की राजनीति में वोट बैंक के लिए एक संवेदनशील अखाड़ा भी रही है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9वीं और 10वीं के लिए 'त्रि-भाषा नीति' को अनिवार्य करने का निर्णय इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में एक युगांतकारी कदम के तौर पर लिया है। यह नीति केवल एक शैक्षणिक सुधार नहीं, ये तो भारत के भाषाई परिदृश्य को पुनर्गठित करने और उस मानसिक औपनिवेशिकता को तोड़ने का एक साहसिक कदम है, जिसने दशकों दशक से देश को उत्तर और दक्षिण के कृत्रिम भाषाई खांचों में बांट रखा है। शुरुआत सीबीएसई त्रिभाषा को समझने से ही करते हैं। नए नियमों के अनुसार, अब माध्यमिक स्तर (कक्षा 9 और 10) के प्रत्येक छात्र को तीन भाषाओं को पढ़ना होगा। इसमें सबसे क्रांतिकारी और सामाजिक बदलाव यह है कि इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं मूल भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। खबरें और भी इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। वर्ष 2023 में नेशनल कैरिकुलम फ्रेमर्वक बना। इस स्कीम आफ स्टडीज में किसी भाषा विशेष का उल्लेख न करते हुए उसे समभाव तरीके से परिभाषित किया गया। एक नए सोच को सामने रखते हुए पहली, दूसरी और तीसरी भाषा की जगह आर-1, आर-2 और आर-3 शब्द का प्रयोग किया गया। चूंकि साक्षरता की पहली सीढ़ी पढ़ने से यानी रीडिंग से होती है तो आर-1 में मातृभाषा या राज्य की भाषा को पहला स्थान मिला। जी, ठीक उसी भांति जैसे किसी भी बच्चे के जन्म से आत्म विमुक्त होने तक मां का औदा सर्वोपरि होता है। इसीलिए मातृभाषा है। इसमें मातृभाषा और राज्य दोनों को रखा गया क्योंकि यह जरूरी नहीं कि मातृभाषा और राज्य भाषा एक हो। दोनों अलग-अलग हो सकती हैं। अब आर-2 में आर-1 के अलावा कोई भी भाषा हो सकती है। यदि कोई छात्र आर-2 में अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन, जापानी, स्पेनिश) का चयन करता है, तो उसे 'गैर-भारतीय' भाषा माना जाएगा। हां, यह अंग्रेजी के एकाधिकार को चुनौती देती है और भारतीय भाषाओं को उनका स्वाभिमान वापस लौटाती है।

आर-3 में आर-1 और आर-2 के अलावा कोई भी भारतीय भाषा। दरअसल, होता क्या था कि वर्ष 2020 से पहले बच्चे तीसरी भाषा के रूप में फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या अंग्रेजी पढ़कर आगे निकल जाते थे। पर राज्यों में तो ऐसा हो नहीं पाता था, लेकिन सीबीएसई में तो इसी तरह से किया जाता था। अब नई शिक्षा नीति के तहत ऐसा नहीं हो पाएगा। सबसे अहम यह है कि अब हर विद्यार्थी को दो भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से सीखनी होंगी। अब इसमें कोई भी भाषा या हिंदी ही जिस पर सर्वाधिक थोपे जाने के आरोप लग रहे, वो तो कहीं नहीं हो रहा। हां, वर्तमान सरकार ने सर्वसमावेशक, सार्वभौमिक व सार्वदेशिक भाषा नीति जरूर अपनाई है। छात्रों पर बोर्ड परीक्षा का अत्यधिक तनाव न बढ़े, इसके लिए इसमें एक व्यावहारिक व्यवस्था की गई है। कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा केवल दो भाषाओं के लिए होगी, जबकि तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर इंटर्नल अससेमेंट रूप से किया जाएगा। यह लचीलापन छात्रों को बिना किसी मानसिक दबाव के एक नई भारतीय भाषा सीखने का अवसर देता है। भारत में क्यों जरूरी है त्रि-भाषा नीति भारत में इस नीति की आवश्यकता के पीछे गहरा सांस्कृतिक, सामाजिक और संज्ञानात्मक भी जुड़ा है। सोचिए, आपने भी अनुभव किया होगा, एक उत्तर भारतीय छात्र का तमिल या कन्नड़ सीखना या एक दक्षिण भारतीय छात्र का हिंदी या बंगाली सीखना केवल अक्षरों के ज्ञान तक सीमित नहीं होता है। यह उस भूगोल की संस्कृति, लोककथाओं और जीवन दर्शन से जुड़ता चला जाता है। यह नीति राज्यों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का काम करेगी। जहां तक संज्ञानात्मक होने की बात है, आप भी आज की पीढि़ और भविष्य के युवा देश के लिए चाहेंगे उसका विकास बहुभाषी के रूप में हो। आधुनिक न्यूरोसाइंस और शिक्षाशास्त्र के शोध भी सिद्ध कर चुके हैं कि बहुभाषावाद बच्चों के दिमाग के विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। जो बच्चे एक से अधिक भाषाएं सीखते हैं, उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता, तार्किक शक्ति और रचनात्मकता अन्य बच्चों की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर होती है। और भाषाई विविधता तो भारत की ताकत रही है। जब देश का युवा वर्ग एक-दूसरे की भाषाओं में घुलमिल जाएगा, तो वह 'क्षेत्रीय संकीर्णता' से ऊपर उठकर 'राष्ट्र-प्रथम' की भावना के साथ ही आगे बढ़ेगा। निश्चित ही भविष्य में "एक भारत, श्रेष्ठ भारत" के सपने को साकार करने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी भाषा को समाज व देश को आपस में जोड़ने का साधन बताया है। भारत में अलग-अलग भाषा बोलने वालों के बीच जो आत्मीयता है, यह आत्मीयता ही एकता का निर्माण करती है।

विविधता सौंदर्य है, एकता शक्ति है। भाषा के नाम पर होती रही है राजनीति इस नीति के सबसे महत्वपूर्ण आयाम को समझे बिना यह विमर्श अधूरा है, वह है भारत में भाषाओं को लेकर होने वाली राजनीति। ये किसी से छिपा नहीं है और भारत का भाषाई इतिहास गवाह है कि कैसे भाषा को संवाद के माध्यम के बजाय 'विभाजन के हथियार' के रूप में इस्तेमाल किया गया। अंग्रेज तो खदेड़ दिए गए थे लेकिन उनकी फूट डालो राज करने की षड्यंत्रकारी नीति को नहीं छोड़ा था। उसका चरितार्थ करते हुए भाषा के आधार पर समाज को हमेशा पाटा गया। थामस बैबिंगटन मैकाले ने जब 1835 में अपनी शिक्षा पद्धति लागू की, तो उसका उद्देश्य भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो 'रंग और रक्त से भारतीय हो, लेकिन विचारों, भाषा और बुद्धि से अंग्रेज हो'। अंग्रेजों ने जानबूझकर अंग्रेजी को उच्च वर्ग और सत्ता की भाषा बनाया और स्थानीय भाषाओं को हीन भावना से जोड़ दिया। आजादी के बाद भी, दुर्भाग्य से हमारे देश के राजनीतिक नेतृत्व ने इस औपनिवेशिक मानसिकता को नहीं छोड़ा। राजनीतिक दलों ने अपने संकुचित वोट बैंक के लिए भाषाई दीवारों को और ऊंचा किया। दक्षिण भारत में 'हिंदी थोपने' के नाम पर हिंसक आंदोलन खड़े किए गए, तो उत्तर भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति उदासीनता बरती गई। पिछले दिनों ज्ञात होगा त्रिभाषा फार्मूले को तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपने का आरोप के रूप में लाग लपेटकर राजनीति करनी चाही थी। संसद में इस पर खूब हंगामा भी हुआ था। गृहमंत्री अमित शाह ने भी इस पर दो टूक जवाब दिया था। नेताओं ने हमेशा जनता को यह डराकर लड़ाया कि दूसरी भाषा सीखने से उनकी ‘मातृभाषा’ नष्ट हो जाएगी। तमिलनाडु में 12 प्रतिशत लोग गैर तमिलभाषी हैं, जो 14 अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं। इससे समस्या यह होती है कि तमिलनाडु के 12 प्रतिशत विद्यार्थी अपनी मातृभाषा ही नहीं सीख पाते। दूसरी, बड़ी परेशानी यह है कि एक और भारतीय भाषा नहीं जानने के कारण यहां के युवा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगी परीक्षा और दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं से वंचित रह जाते हैं। तीसरी परेशानी, तमिलनाडु से अगल-बगल के राज्यों में काम करनेवाले श्रमिकों को भी भाषा की परेशानी होती है। वहीं, दूसरे राज्यों से यहां आने वाले कर्मचारियों व श्रमिकों के बच्चे भी अपनी भाषा नहीं सीख पाते हैं। दरअसल, यह तमिलनाडु को देश के अन्य राज्यों से अलग-थलग करने जैसी साजिशें/कोशिशें हमेशा होती रही हैं। चेन्नई के 44 प्रतिशत गैर तमिलाभाषी हैं। अब भला, खुद सोचें, क्या भारतीय सभ्यता, संस्कृति के संस्कार ऐसे सोच को स्वीकार कर सकते हैं कि मातृभाषा यानी किसी की ‘मां’ को नष्ट करने जैसा कुकृत्य किया जाए।

हां, यह ठीक वैसी ही राजनीति, कुसंस्कार जरूर हैं जैसा अंग्रेज करते थे, जनता को आपस में लड़ाकर अपनी सत्ता सुरक्षित रखना। हालांकि दक्षिण में भाषा के नाम पर दक्षिण भारत की आबादी को भड़काने वाले स्टालिन को इस बार के विधानसभा चुनाव में जवाब भी मिल गया है। विरोध से लागू करने की चुनौतियों तक अब बात आती है इस त्रिभाषा को लेकर स्वजन और छात्रों की चिंता की। साथ ही इसे लागू करने की चुनौतियों की। इसमें कोई दोराय सिद्धांत रूप में यह नीति जितनी उत्कृष्ट है, धरातल पर इसे लागू करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। वर्तमान में इसे लेकर कई गंभीर चुनौतियां सामने आ रही हैं। हाल ही में सीबीएसई के 12 वीं के परिणाम से निराश छात्र और उनके स्वजन पहले ही डरे हुए हैं, उनके अंदर इस त्रिभाषा फार्मूला को लेकर और संशय पैदा हो रहे हैं। अब तक स्कूलों में जड़ जमा चुका विदेशी भाषा सीखने का चलन, उस पर नीति अनुसार संशय के काले बादल नहीं हैं, पर अंग्रेजी का भी उस श्रेणी में होना अनावश्यक चिंता बढ़ा रहा है। हां, असल चिंता तो आज भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के सात साल बाद भी सशक्त लागू करने की व्यवस्था नहीं होना है। हम राजनीतिक उबाल, और शिक्षकों में स्कूलों में ये द्वेष पैदा करने पर तो श्रम-समय बर्बाद कर रहे हैं कि इससे देश का तुष्टिकरण हो रहा, लेकिन देशहित की इस नीति को सफल कैसे बनाया जाए, राज्यों में शिक्षकों की कमी को कैसे दूर किया जाए। शिक्षकों को भाषा विशेषज्ञ स्कूल स्तर पर कैसे बढ़ाया जाए उस पर नहीं सोच रहे। शिक्षा प्रणाली की सुस्ती भी इसके लिए बराबर की दोषी है, जब कोई वयवस्था तय की गई तो उसे एक निश्चित समय अंतराल में बहुत प्रभावी ढंग से तैयार कर लागू करना भी उसका उतना ही नैतिक कर्तव्य बनता है जितना उसके निर्माण उद्रदेश्य में रहा। एनसीईआरटी और सीबीएसई के स्तर पर अभी भी सभी भारतीय भाषाओं के लिए आधुनिक और आकर्षक शिक्षण सामग्री पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है। सत्र शुरू होने के समय पुस्तकों की कमी छात्रों में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। ये सब अन्यमनस्कता, हीलाहवाली उस दौर में और अधिक खटकती हैं जब आप तकनीकी रूप से शिक्षा क्षेत्र में सक्षम हो रहे हों। 'दीक्षा' जैसे डिजिटल प्लेटफार्म, एआइ टूल्स और वर्चुअल क्लासरूम इन सबका सद्उपयोग कर इसे तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। दक्षिण भारत के शिक्षक आनलाइन माध्यम से उत्तर भारत के बच्चों को पढ़ा सकते हैं।

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