अमेरिकी टैरिफ होगा बेअसर: भारत ने ब्रिक्स देशों में तलाशे नए बाजार, जेनेरिक दवाओं के लिए 3.5 गुना बड़ा बाजार
ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में भारत ने इस संगठन के सभी सदस्य देशों के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग का ऐसा रोडमैप रखा है
ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में भारत ने इस संगठन के सभी सदस्य देशों के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग का ऐसा रोडमैप रखा है, जिससे भारतीय दवा कंपनियों को अमेरिका के मुकाबले 3.5 गुना बड़ा बाजार मिल जाएगा। चंडीगढ़ में हुई ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की 16वीं बैठक में इसको हरी झंडी भी मिल गई। सदस्य देशों ने भारत के प्रस्ताव पर मुहर लगाते हुए सस्ती दवाओं, वैक्सीन, मेडिकल प्रोडक्ट्स, डिजिटल हेल्थ व पारंपरिक चिकित्सा (आयुष) पर सहयोग बढ़ाने का फैसला किया। संगठन के स्तर पर हुए इस समझौते के बाद अब भारत ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों के साथ सहयोग के लिए अलग-अलग द्विपक्षीय समझौता करने की प्रक्रिया में है।अभी इन समझौतों पर हस्ताक्षर होने या लागू किए जाने की कोई समय सीमा तय नहीं है लेकिन माना जा रहा है कि इनके अमल में आने के बाद ब्रिक्स और उससे जुड़े प्रमुख उभरते बाजारों खासतौर पर इंडोनेशिया, ब्राजील, रूस, यूएई, मिस्र, इथियोपिया, अफ्रीकी देश और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत यदि सिर्फ 10 फीसदी जेनेरिक दवा बाजार भी हासिल कर लेता है, तो करीब 35 अरब डॉलर (लगभग 3 लाख करोड़ रुपये) का नया कारोबार बन सकता है।
यह अमेरिका को होने वाले मौजूदा 9.7 अरब डॉलर के निर्यात से करीब साढ़े तीन गुना अधिक है।स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी आईक्यूवीआईए के अनुसार अमेरिका में लगभग 47% जेनेरिक दवाओं की मांग भारतीय कंपनियां पूरी करती हैं। वहां भारतीय जेनेरिक दवाओं की तुलना में ब्रांडेड दवाएं 7 से 10 गुना तक महंगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 100 या 200 फीसदी टैरिफ लगने से ये ब्रांडेड से सस्ती ही रहेंगी मगर टैरिफ का असर आम अमेरिकी मरीजों, अस्पतालों और बीमा कंपनियों पर पड़ेगा।ब्रिक्स अब केवल पांच देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका का समूह नहीं है।
इसमें अब मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया, ईरान और इंडोनेशिया भी शामिल हो चुके हैं।स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इनमें कई ऐसे बाजार हैं जहां भारतीय जेनेरिक दवाओं की मौजूदगी सीमित है, लेकिन मांग तेजी से बढ़ रही
है। ब्राजील लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा फार्मा बाजार है, लेकिन वहां भारत की हिस्सेदारी बेहद कम है। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका और पूरे अफ्रीका में टीबी, एचआईवी, मधुमेह और रक्तचाप की दवाओं की भारी मांग है।
