Jantar Mantar Protest: घर-घर पहुंचा आंदोलन, दिलों तक पहुंची विरोध की आवाज; 'पीड़ित' अभिभावक और छात्र हुए मुखर
कभी सिर्फ जंतर-मंतर और सड़कों तक सीमित दिखाई देने वाला विरोध अब लोगों की भावनाओं से जुड़ रहा है। संसद चलो मार्च के बाद सामने
कभी सिर्फ जंतर-मंतर और सड़कों तक सीमित दिखाई देने वाला विरोध अब लोगों की भावनाओं से जुड़ रहा है। संसद चलो मार्च के बाद सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने कई लोगों को भावुक किया है। सोशल मीडिया से लेकर मोहल्लों की चौपाल और चाय की दुकानों तक इस आंदोलन की चर्चा हो रही है। प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के वीडियो वायरल होने के बाद कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। किसी ने छात्रों के साहस की सराहना की, तो किसी ने व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता जताई।
आरके पुरम निवासी सना ने बताया कि जब कोई आंदोलन लोगों के निजी अनुभवों और भावनाओं से जुड़ जाता है, तब उसकी गूंज धरना स्थल से कहीं आगे तक सुनाई देती है। यही वजह है कि संसद चलो केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं की आकांक्षाओं, भरोसे और भविष्य को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुई कार्रवाई के दृश्य देखकर कई माता-पिता ने अपनी पीड़ा और चिंता खुलकर व्यक्त की। उनका कहना है कि जिन बच्चों को उन्होंने बेहतर भविष्य के सपने के साथ पढ़ाया-लिखाया, आज वही अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष करने को मजबूर हैं।सोशल मीडिया पर कई अभिभावकों ने लिखा कि वीडियो देखते समय उन्हें अपने बेटे-बेटियों की याद आ गई।
कुछ ने कहा कि अगर वहां हमारा बच्चा होता तो शायद हम यह सब देखकर खुद को संभाल नहीं पाते। कई अभिभावकों ने बताया कि इसे केवल एक छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि हर उस परिवार की चिंता बताया, जिसकी उम्मीदें शिक्षा और रोजगार से जुड़ी हैं।दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को शिक्षाविद् और कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर आमरण अनशन के 21वें दिन जबरन सफदरजंग अस्पताल ले जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि इस मामले को पहले ही वांगचुक की पत्नी हाईकोर्ट के समक्ष उठा चुकी हैं और याचिका उस समय उनके संतोष पर निस्तारित कर दी गई थी।पीठ ने कहा, घटना से संबंधित चिंताओं और प्रार्थनाओं को दोबारा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने याचिकाकर्ता शकील अब्बास को सलाह दी कि अगर वे अब भी पीड़ित महसूस करते हैं तो वह संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कराएं।
