India: देश में हर चार में तीन मौतों का नहीं बनता मृत्यु प्रमाणपत्र, मौत की असली वजह नहीं आ पाती है सामने
देश में दर्ज होने वाली हर चार मौतों में से सिर्फ एक मौत का ही डॉक्टर द्वारा प्रमाणित मृत्यु प्रमाणपत्र बन पाता है। यानी चार
देश में दर्ज होने वाली हर चार मौतों में से सिर्फ एक मौत का ही डॉक्टर द्वारा प्रमाणित मृत्यु प्रमाणपत्र बन पाता है। यानी चार में से तीन मौतों की वजह का कोई पुख्ता चिकित्सीय रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो पाता। गोवा में दर्ज सभी मौतों का चिकित्सीय प्रमाणन होता है, जबकि महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 44%, उत्तर प्रदेश में 6.7% और बिहार में केवल 3.6% है। प्रमाणित मौतों में 5.1% एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं की थीं।
शिशुओं की 66.7% मौतें प्रसव के दौरान या जन्म के तुरंत बाद हुईं। कुल प्रमाणित मौतों में 58.6% पुरुष और 41.4% महिलाएं थीं। प्रत्येक 1,000 पुरुष मौतों पर 706 महिलाओं की मौत दर्ज की गई। महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश में मौत के कारणों का सटीक रिकॉर्ड तैयार करने की व्यवस्था में अभी काफी सुधार की जरूरत है। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024 में देशभर में 89,38,301 मौतें दर्ज की गईं।
इनमें से केवल 23.1% मामलों में ही डॉक्टरों ने मृत्यु के कारण का चिकित्सीय प्रमाणन किया। राज्यों की बात करें तो पुडुचेरी में 91%, लक्षद्वीप में 98.5%, पश्चिम बंगाल में 40%, तमिलनाडु में 38.7% और तेलंगाना में 38.3% मौतों का चिकित्सीय प्रमाणन हुआ। वहीं बिहार में यह आंकड़ा केवल 3.6%, हरियाणा में 6.4% और अरुणाचल प्रदेश में 8.7% रहा। क्या है नियम? जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर डॉक्टर के लिए उसकी मृत्यु के कारण और संबंधित बीमारी का पूरा विवरण दर्ज करते हुए चिकित्सा मृत्यु प्रमाणपत्र निःशुल्क रजिस्ट्रार को उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
यदि किसी व्यक्ति की मौत अस्पताल के बाहर होती है, लेकिन उसकी अंतिम बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर ने किया था, तो उस डॉक्टर के लिए भी मृत्यु के कारण का चिकित्सा प्रमाणपत्र जारी करना जरूरी होता है।
