'आरोपी के घर 2 साल तक न चले बुलडोजर', इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों ने स्प्लिट वर्डिक्ट दिया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ यानी आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों के दंडात्मक ढांचे गिराने के मुद्दे पर विभाजित (स्प्लिट) फैसला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ यानी आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों के दंडात्मक ढांचे गिराने के मुद्दे पर विभाजित (स्प्लिट) फैसला सुनाया है. बेंच के वरिष्ठ जज जस्टिस अतुल श्रीधरन ने आदेश दिया कि FIR दर्ज होने की तारीख से दो साल तक आरोपी के घर को न ढहाया जाए, लेकिन दूसरे जज जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस पर असहमति जताई.
जजों के बीच मतभेद को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले को तीसरे जज की राय के लिए चीफ जस्टिस को रेफर कर दिया है. ये याचिका हमीरपुर जिले के सुमेरपुर थाने में पोक्सो और धर्मांतरण कानून के तहत दर्ज एक मामले से जुड़ी है. सोमवार को पारित अपने अलग फैसले में वरिष्ठ जज जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि किसी अपराध के आरोपी के घर को नगर पालिका (म्युनिसिपल) कानूनों के उल्लंघन की आड़ में जल्दबाजी में ढहाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है.
उन्होंने इसे कार्यपालिका (अधिकारियों) की बदले की कार्रवाई करार दिया. जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो साल की अवधि तक आरोपी का मकान ढहाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. दूसरी ओर जस्टिस नंदन ने कहा कि हमेशा ये माना जाता है कि सरकार कानून के अनुसार ही काम करेगी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करेगी.
उन्होंने आगे कहा कि पीड़ित व्यक्ति के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है. उनकी राय में कार्रवाई रोकने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि इसका नतीजा किसी कानून के संचालन को उस अवधि के लिए स्थगित रखना होगा.
