क्यों घिरी आर्ट ऑफ लिविंग संस्था: रविशंकर के आश्रम ने की सरकारी जमीन पर कब्जा, 290 एकड़ का पूरा सच क्या?
मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए सरकार ने एक विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन कर दिया है। एसआईटी को तीन महीने
मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए सरकार ने एक विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन कर दिया है। एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपने का कड़ा निर्देश दिया गया है। दूसरी तरफ, आर्ट ऑफ लिविंग ने इस जांच का स्वागत किया है और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।यह पूरा मामला बंगलूरू दक्षिण तालुक के कागलीपुरा गांव और उसके आसपास की जमीनों से जुड़ा हुआ है। राजस्व विभाग ने 17 जुलाई को कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम 1964 और कर्नाटक भूमि कब्जा निषेध अधिनियम 2011 के तहत जांच का आदेश जारी किया। अक्टूबर 2025 में कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देश पर भूमि अभिलेख सहायक निदेशक (एडीएलआर) की ओर से एक सर्वे कराया गया था। इस सर्वे की शुरुआती रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए।सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, आर्ट ऑफ लिविंग के ट्रस्टियों और कुछ अन्य लोगों ने मिलकर 290 एकड़ से अधिक सरकारी गोमाला (चरवाहों की) जमीन पर सीधा या अप्रत्यक्ष कब्जा कर रखा है।साल 1985 में कागलीपुरा के सर्वे नंबर 46 की 41 एकड़ सरकारी जमीन संस्था को 40 साल के लिए लीज पर दी गई थी।
इसका सालाना किराया मात्र 500 रुपये प्रति एकड़ था।यह लीज अवधि साल 2015 में ही समाप्त हो चुकी है। लीज का नवीनीकरण नहीं कराया गया, फिर भी जमीन पर कब्जा लगातार बरकरार है।जिस मकसद और काम के लिए जमीन आवंटित की गई थी, वहां उसका इस्तेमाल उस काम के लिए नहीं किया जा रहा है।सरकार द्वारा गठित एसआईटी को इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं:और संस्थागत दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जाएगी।जमीन आवंटन की असली प्रतियों की जांच होगी ताकि जाली या फर्जी दस्तावेजों को पकड़ा जा सके।उपग्रह तस्वीरों यानी सैटेलाइट इमेज के जरिए पर्यावरण नुकसान, सरकारी झीलों और सार्वजनिक जमीनों का आकलन होगा।अदालत में लंबित पड़े सभी पुराने मुकदमों की जांच की जाएगी।संबंधित उत्तरदाताओं को पूछताछ के लिए समन भेजा जाएगा।कागलीपुरा के सर्वे नंबर 160, 164/1, 164/2, 150 और 137 में सरकारी जमीन, तालाबों और राजकैलुवे (बारिश के पानी के नालों) पर अवैध निर्माण की जांच होगी।कागजात में 'उदयापुरा' नाम का पता दिया गया है, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में इस नाम का कोई गांव ही मौजूद नहीं है।द आर्ट ऑफ लिविंग ने सरकार के इस फैसले पर बेहद सकारात्मक रुख दिखाया है।
संस्था का कहना है कि वे इस जांच से बिल्कुल भी डरते नहीं हैं। निष्पक्ष जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा।द आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से कहा गया कि हमारे ऊपर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद हैं। कब्जे का सवाल ही पैदा नहीं होता। चार-पांच महीने पहले हुए सरकारी सर्वे में यह साबित हो चुका है कि सरकार द्वारा दी गई 60 एकड़ जमीन में से केवल 36 एकड़ ही हमारे पास है। बाकी 24 एकड़ जमीन तो सरकार ने आज तक हमें सौंपी ही नहीं है।संस्था ने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ साजिश के तहत दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया जा रहा है। एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) अपने फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं, जिन पर खुद कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।
