ED: सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर सीनियर सिटिजन को किया डिजिटल अरेस्ट, ₹2.60 करोड़ की धोखाधड़ी
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पणजी जोनल ऑफिस (गोवा) ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए, 2002 की धारा 17 के तहत कई राज्यों में तलाशी अभियान
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पणजी जोनल ऑफिस (गोवा) ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए, 2002 की धारा 17 के तहत कई राज्यों में तलाशी अभियान चलाया है। यह कार्रवाई बड़े पैमाने पर हुई 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर-धोखाधड़ी की जांच के सिलसिले में की गई। इसमें एक सीनियर सिटिजन के साथ लगभग 2.60 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई थी। आरोपियों ने सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर सीनियर सिटिजन को 'डिजिटल अरेस्ट' किया था। ईडी ने साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आधार पर इस मामले की जांच शुरू की है। धोखेबाजों ने सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर पीड़ित को नकली 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा। जाली दस्तावेज़ों व लगातार वीडियो निगरानी के ज़रिए उन्हें अपने पैसे सिंडिकेट के कंट्रोल वाले अकाउंट्स में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। इस केस की जांच में एक संगठित नेटवर्क के काम करने के तरीके का पता चला है, जो साइबर-क्राइम से कमाए गए पैसे को कैश में बदलता है और उसे देश से बाहर भेजता है।इस तरह के 'डिजिटल अरेस्ट' और उससे जुड़े साइबर स्कैम में, धोखेबाज पहले पीड़ितों से पैसे लेकर उन्हें कुछ खास 'म्यूल' बैंक अकाउंट्स में जमा करवाते हैं।
ये अकाउंट्स अलग-अलग लोगों और ऐसी कंपनियों के नाम पर खोले जाते हैं जो असल में काम नहीं कर रही होतीं। ट्रेसिंग से बचने के लिए, पैसे को तेजी से कई हिस्सों में बांटा जाता है और सैकड़ों अकाउंट्स और शेल/कंड्यूट कंपनियों के जाल के ज़रिए घुमाया जाता है।ईडी के अनुसार, ये आमतौर पर नई बनी फर्में होती हैं जिनके नाम में 'कमोडिटीज', 'एंटरप्राइजेज' या 'ट्रेडिंग' जैसे शब्द होते हैं, लेकिन ये कोई असली कारोबार नहीं करतीं। इनका मकसद सिर्फ़ गलत तरीके से कमाए गए पैसे को लेना, उसकी लेयरिंग करना और आगे भेजना होता है। इसके बाद, लेयरिंग किए गए पैसे को बल्क कैश-डिपॉजिट मशीनों के ज़रिए बड़े पैमाने पर कैश जमा करके औपचारिक बैंकिंग सिस्टम में वापस लाया जाता है। ईडीके मुताबिक, उसके बाद पैसे को फॉरेक्स कंपनियों की एक चेन में भेजा जाता है।ये फॉरेक्स कंपनियां, जिनमें से कई के पास असली मनी-चेंजर लाइसेंस होते हैं, जिन्हें सिंडिकेट ने चुपके से अपने कंट्रोल में ले लिया होता है या जिनका इस्तेमाल वे मुखौटे के तौर पर करते हैं।ये कंपनियां नकली इनवॉइस के बदले बैंकिंग चैनलों के जरिए पैसे लेती हैं और बदले में उतनी ही कीमत की विदेशी मुद्रा देती हैं।
असल में, गलत तरीके से कमाए गए भारतीय रुपयों को अमेरिकी डॉलर और दूसरी विदेशी मुद्राओं में बदला जाता है, जिन्हें फिर फिजिकली ले जाया जाता है, विदेश में खर्च किया जाता है। मतलब, किसी दूसरे तरीके से उस पैसे को भारत से बाहर भेज दिया जाता है। इस तरह अपराध से कमाए गए पैसे का प्लेसमेंट, लेयरिंग और इंटीग्रेशन पूरा हो जाता है। असली पीड़ितों से ऑडिट ट्रेल (पैसे के लेन-देन का रिकॉर्ड) का लिंक टूट जाता है। ये तलाशी अभियान इस नेटवर्क का हिस्सा रहे ऑपरेटरों, कंट्रोलरों और माध्यम का काम करने वाली संस्थाओं के खिलाफ चलाए गए।तलाशी अभियान के दौरान, ईडी ने लगभग 1.5 करोड़ रुपये की भारतीय मुद्रा, लगभग 2 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा और लगभग 1.5 करोड़ रुपये मूल्य का सोना और गहने जब्त किए हैं। इसके अलावा, एक महंगी गाड़ी (टोयोटा फॉर्च्यूनर) और अन्य चल संपत्तियां भी जब्त की गई हैं। डिजिटल डिवाइस (जैसे मोबाइल फोन और लैपटॉप) के रूप में ठोस सबूत भी मिले हैं, जिनसे फंड के लेन-देन और सिंडिकेट के कामकाज का पता चलता है, इन्हें भी जब्त कर लिया गया है।
