PM मोदी बोले- अकाली दल 'स्वार्थी', पंजाब में क्या माहौल?:सुखबीर बोले- हमारे बारे में नहीं कहा, वल्टोहा का तंज- ये बंगाल नहीं; 2027 में गठबंधन होगा या नहीं
PM नरेंद्र मोदी के 17 जुलाई को जालंधर में अकाली दल को स्वार्थों में फंसे होने के बयान से 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले
PM नरेंद्र मोदी के 17 जुलाई को जालंधर में अकाली दल को स्वार्थों में फंसे होने के बयान से 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब पॉलिटिक्स में नई बहस छेड़ दी है। ये बहस चुनाव में अकाली दल से गठबंधन को लेकर हो रही है। पहले अकाली दल व भाजपा के गठबंधन को नाखून-मांस का रिश्ता कहा जाता था। मगर, PM के बयान से भाजपा के सभी 117 सीटों पर अकेले लड़ने की तैयारी दिख रही है। हालांकि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल ने PM के बयान को यह कहकर टाल दिया कि ये बात हमारे लिए नहीं कही। मगर, उनके करीबी सीनियर नेता विरसा सिंह वल्टोहा ने सीधे चैलेंज करते हुए कहा कि ये बंगाल नहीं है।
अगर गठबंधन नहीं करना तो सर्वे क्यों करवा रहे हो। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा-अकाली गठबंधन फिर बनेगा या दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे?। गठबंधन को लेकर बहस क्यों छिड़ी गठबंधन को लेकर पार्टी में 2 राय प्रधानमंत्री के बयान से पहले भी भाजपा के भीतर गठबंधन को लेकर अलग-अलग संकेत मिल चुके हैं। गठबंधन पर BJP का औपचारिक पक्ष क्या है, पार्टी अध्यक्ष का बयान पढ़िए.. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कुछ दिन पहले जालंधर में दौरे के दौरान गठबंधन के सवाल पर कहा कि विधानसभा चुनाव में अभी समय है। चुनाव नजदीक आने पर पार्टी नेतृत्व परिस्थितियों के हिसाब से फैसला करेगा। फिलहाल गठबंधन को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
जानिए, अकाली-भाजपा गठबंधन का पिछले चुनावों में कैसा प्रदर्शन रहा भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन करीब 3 दशक तक पंजाब की राजनीति की सबसे सफल चुनावी गठजोड़ों में रहा। दोनों दलों ने 1997, 2007 और 2012 में मिलकर सरकार बनाई। भाजपा-अकाली गठबंधन की कामयाबी का राज क्या था भाजपा-अकाली गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत दोनों दलों का अलग-अलग वोट बैंक था। अकाली दल की पकड़ ग्रामीण, किसान और पंथक इलाकों में थी, जबकि भाजपा शहरों और शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत थी। दोनों दलों के साथ आने से गांव और शहर का चुनावी समीकरण बन जाता था। दूसरी बड़ी वजह थी तय सीट शेयरिंग और मजबूत संगठन। लंबे समय तक अकाली दल 94 और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही।
दोनों पार्टियां अपने-अपने मजबूत क्षेत्रों में चुनाव लड़ती थीं और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी एक-दूसरे का साथ मिलता था। गठबंधन की वजह से दोनों दलों का वोट बंटने के बजाय एक जगह ट्रांसफर होता था और कई सीटों पर मुकाबला मजबूत बन जाता था। यही समीकरण 2012 में गठबंधन की बड़ी जीत का आधार बना, जब दोनों दलों ने मिलकर 68 सीटें जीतकर सरकार बनाई। लेकिन 2022 में गठबंधन टूटने के बाद दोनों का वोट अलग-अलग बंट गया और दोनों दल दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाए। भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने का विरोधियों पर असर ***********