अंतरधार्मिक विवाह पर पारसी महिला से भेदभाव का मामला पहुंचा SC, समान अधिकार की मांग
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। एक पारसी महिला की अपने ही धर्म में समानता और सम्मान से जीने की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने स्पष्ट किया है कि अंतर-धार्मिक विवाह करने वाली पारसी महिलाओं
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। एक पारसी महिला की अपने ही धर्म में समानता और सम्मान से जीने की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने स्पष्ट किया है कि अंतर-धार्मिक विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के इस संवेदनशील मामले पर फैसला, सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की संविधान पीठ के आने वाले फैसले के बाद ही किया जाएगा।
क्या आस्था की भी कोई लैंगिक सीमा होती है? किसकी है यह कानूनी लड़ाई? यह भावुक कर देने वाली कानूनी लड़ाई दीना बुधराजा की है, जिन्होंने एक हिंदू पुरुष से शादी की, लेकिन अपनी आस्था नहीं बदली। साल 2024 में उनकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक पल तब आया, जब उन्हें अपनी सगी दादी के अंतिम संस्कार में नागपुर की अज्ञारी (पारसी अग्नि मंदिर) में प्रवेश करने से रोक दिया गया।
नागपुर पारसी पंचायत का नियम 5(2) कहता है कि यदि कोई पारसी महिला दूसरे धर्म में शादी करती है, तो उसकी धार्मिक पहचान और अज्ञारी में प्रवेश का हक छीन लिया जाता है, जबकि गैर-पारसी महिला से शादी करने वाले पारसी पुरुषों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। न्याय की चौखट पर समानता की पुकार दीना ने अपने वकील रोहित अनिल राठी के जरिये सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि इस भेदभावपूर्ण नियम को रद किया जाए।
याचिका में कहा गया है कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का खुला उल्लंघन है। खबरें और भी
